लघु कथा! तजुर्बा

कुछ देर वीडियो देखने के बाद माँ ने पूछा - 'बहिनी ई दंगा कब तक होवै के आदेश बा सरकार के...?' इस प्रश्न के लिए बिटिया तैयार नहीं थी... उसने चौंककर पूछा- 'मतलब?'

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मेट्रो में एक बुजुर्ग महिला बैठी हैं… साथ उनकी बेटी है… दोनों भोजपुरी में बातें कर रही हैं… बातों का टॉपिक गाँव का कोई परिवार है जिसमें सभी लोग बहुत घमंडी हैं…! बिटिया को माँ सीख दे रही हैं कि जब रावण का घमंड चूर-चूर हो गया तो ये लोग किस खेत की मूली हैं… बिटिया माँ को दिल्ली के दंगों के वीडियोज़ मोबाईल में दिखाने लगती है…!

कुछ देर वीडियो देखने के बाद माँ ने पूछा – ‘बहिनी ई दंगा कब तक होवै के आदेश बा सरकार के…?’ इस प्रश्न के लिए बिटिया तैयार नहीं थी… उसने चौंककर पूछा- ‘मतलब?’ माँ ने प्रश्न दोहराया… तो बिटिया ने कहा – ‘सरकार थोड़ै ना दंगा करावे के आदेश देहले बा?’

माँ के चेहरे पर सारी उम्र का अनुभव उतर आया.. चेहरे पर बिटिया की अबोधता का मज़ाक उड़ाती मुस्कुराहट की लकीर उभर गई और वे बोलीं – ‘बै… तोहके का पता… बिना सरकार के आदेस के कुछ्छो नाही होत…!’ बिटिया ने प्रतिवादस्वरूप अपना ज्ञानात्मक प्रश्न किया-‘ कौन सरकार देहले बा आदेस… दिल्ली वाली या केन्द्र वाली?’

माँ के चेहरे पर उभरी वो लकीर और गाढ़ी हुई.. उन्होंने जवाब दिया- ‘जइसे भगवान एक हैं बस नाम अलग-अलग होत है वइसे सरकार कुल एक्के होत हैं… बहिनी एतना उमर तक हम बहुत सरकार देखले हीं… बहुत दंगा देखले हईं… हमके सिखावा मत…!’

बिटिया चुप हो गई…!

#मेट्रोनामा

देवेश

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