जामिया के गिरफ्तार छात्रों पर क्यों खामोश हैं हम ! कब तक गिरफ्तार रहेंगे छात्र ?

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कोरोना का दौर है और हर इंसान कहीं ना कहीं इस महामारी की मार को महसूस कर रहा है। जहां आए दिन सैकड़ों की संख्या में इंसान इस दुनिया को अलविदा कहकर लौट रहे हैं तो सड़कों पर पैदल यात्रा कर रहे मजदूर वर्ग की भी अपनी ही एक दास्तां है।

दुनिया भर की अलग अलग सरकारें जहां इस महामारी से लड़ने का हल ढूंढ रही हैं वहीं एक सरकार हमारी है। हमारे देश भारत की मोदी सरकार..! कभी कभी महसूस होता की भारत में कोरोना के आने का समय सत्ताधारी भाजपा सरकार के लिए अनुकूल समय रहा है । अब आप सोचेंगे की मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ तो इसे समझने के लिए आपको कहमारी क्रोनोलोजी को समझना होगा। तो आइए समझते हैं

कोरोना के आने से ठीक पहले देश भर में सीएए एनआरसी के विरुद्ध चल रहा आंदोलन मोदी सरकार के लिए एक वास्तविक चुनौती बन चुका था देश भर में दिल्ली के शाहीन बाग़ की तर्ज पर कईसों शाहीन बाग बन चुके थे जिन्होंने महामारी और कोरोना की दहशत के बावजूद अपने कदम पीछे करने से इनकार कर दिया,जो सरकार लगातार दो महीने तक इस आंदोलन को कुचलने के लिए अलग अलग तरह के हथकंडे अपनाती रही चाहे वो तरीका गोली चलवाने का हो या मीडिया ट्रायल्स का… उसे अब एक वैलिड रीजन मिल गया था,इस आंदोलन को खत्म करने की कोरोना के रहते अब आप इकट्ठा नही हो सकते और आपको ये आंदोलन यहीं खत्म करना होगा… फिर शुरू हुआ आंदोलन स्थलों को बेरहमी से उखाड़ने और आंदोलन को खत्म करने का दौर… यही करनोलॉजी है जिसके आधार पर हमने शुरू में ये कहा की सरकार के लिए कोरोना के आने का समय अनुकूल साबित होता दिखा। आगे भी कुछ कारण आएंगे जहां हम साबित करेंगे कि मोदी सरकार ने इस समय को किस तरह अनुकूल बनाया।
जामिया मिलिया इस्लामिया (जेएमआई) और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) देश के दो प्रमुख अल्पसंख्यक संस्थान हैं।

वो इदारे जहां से CAA-NRC के विरुद्ध आंदोलन का बिगुल फूंका गया और ये कहा जाने लगा कि जामिया आज़ादी की लड़ाई का इतिहास दोहरा रहा है…इन दोनों संस्थानों ने यहां दुनिया भर का ध्यान इस आंदोलन की ओर केंद्रित किया और एक पूरे दुनिया से इस आंदोलन को समर्थन मिलने लगा…।

अब कोरोनो के दौर में जब हम लोकडाउन के रहते थम से गए हैं..हर ओर बेहाली और बेबसी है..वहीं हमारी सरकार इन संस्थानों के उन छात्रों को निशाना बना रही है जो CAA-NRC के आंदलोन में भूमिका रखते थे.. सरकार लोकडाउन की आड़ में दिल्ली पुलिस के सहारे बदला लेने की नीति अपनाए हुए है। बदला लेने की नीति हम इसे इसलिए कहेंगे क्योंकि दिल्ली पुलिस द्वारा जेलों में बंद किए गए हर नोजवान का परिचय ये है कि वे संघ परिवार की अलोकतांत्रिक, इस्लामोफोबिक नीतियों के विरुद्ध मुखर आवाज़ उठाते रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने एक ऐसी पटकथा तैयार की है जिसे पढ़कर महसूस होता है कि दिल्ली दंगों के पीछे इन्हीं आंदोलनकारी छात्रों का हाथ है जबकि दिल्ली दंगों के दौरान दिए गए जहरीले भाषण जिसे फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग तक कोट करते हैं देने वाले कपिल मिश्रा का दूर दूर तक इन दंगों से कोई वास्ता नही दिखाया जाता।

अब ग्रह मंत्रालय द्वारा जामिया के छात्रों को जेल में डालकर नागरिक भेदभाव के खिलाफ खड़े हुए आंदलोनों की आवाज़ और सवैंधानिक अधिकारों की मौत का पूरा सामान किया जा रहा है।

आपको 15 दिसम्बर 2019 याद है ? होना तो चाहिए…ये वही तारीख है जब जामिया के केम्पस में घुसकर पुलिस ने बर्बरता का प्रदर्शन किया था…इसी अन्याय के खिलाफ जामिया के छात्र इकट्ठा हुए और जामिया कोर्डिनेशन कमेटी का गठन किया गया…अब सरकार इस कमेटी के छात्र नेताओं को एक एक कर गिरफ्तार कर रही है और अब तक तीन छात्रों को गम्भीर आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया है..जब पुलिस को लगा कि आरोप दम नही रखते हैं तो यूएपीए जैसे काले कानून का सहारा लिया गया।

हम चाहते हैं कि इन छात्रों का परिचय आपके समक्ष रखें और बताएं कि उनकी राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि क्या है।

पहले छात्र हैं बिहार के सीवान जिले के रहने वाले मीरान हैदर..मीरान 2008 में जामिया आए थे..ये वही वर्ष था जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के विरुद्ध एक अभियान चला कर ये बात कही थी कि ये संस्थान आतंकवाद की एक नर्सरी है…….मीरान ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की पढ़ाई की, एमबीए इन इंटरनेशनल बिजनेस का अध्ययन किया और जामिया ही से पश्चिम एशियाई अध्ययन में एम-फिल की डिग्री हासिल की। अब वह विश्वविद्यालय में शोध के छात्र है।

मीरन हमेशा केम्पस पॉलिटिक्स में सक्रिय रहे ; जामिया की छात्र राजनीति अन्य विश्वविद्यालयों से अलग है यहां छात्र सेवा वोट पाने के लिए नही की जाती फिर भी मीरान लगातार यहां सँघर्ष करते रहे ओर जामिया के छात्र नेता के रूप में जाने गए….अपने सक्रिय छात्र जीवन के शुरुआती वर्षों में आम आदमी पार्टी (आप) के छात्र संगठन छात्र युवा शक्ति संगठन (CYSS) के सदस्य थे। वह जामिया स्टूडेंट्स फोरम (JSF) के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं, मीरान CYSS का हिस्सा होते हुए, छात्र संघ चुनाव की बहाली की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन के तहत भूख हड़ताल पर रहे। इन हड़तालों ने विश्वविद्यालय के अंदर की राजनीति को कई तरह से प्रभावित किया। मीरन ने 2019 में CYSS छोड़ दि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का सदस्य बन गए।

मीरान फिलहाल यूवा राजद के दिल्ली प्रदेश अध्य्क्ष हैं वे एक प्रतिभाशाली व्यक्ति है और जामिया नगर और ओखला में विभिन्न सांस्कृतिक और राजनीतिक समारोहों में एक लोकप्रिय चेहरा रहा है। मीरान हैदर सक्रिय रूप से एंटी-सीएए-एनआरसी आंदोलन और विश्वविद्यालय में पुलिस पर हमले के विरोध में खड़े रहे और जेसीसी के एक अहम नेता थे।

लोकडाउन के दौरान मीरान को एक अप्रैल गिरफ्तार किया गया था, जब उन्हें गिरफ्तार किया गया वह महामारी के रहते राहत कार्यों में लगे हुए थे। उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया गया था और बाद में दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ ने गंभीर गैर-जमानती अपराधों के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।मीरान को दो बार जमानत से वंचित कर दिया गया था।

दो महीने हो गए हैं मीरान किस वजह से जेल के भीतर हैं वो वजह तो वाज़ेह नही हुआ लेकिन मीरान के बीमार पिता ओर उनका परिवार उनसे मिल तक नही पा रहा है।

दूसरी गिरफ्तारी सफुरा ज़रगर की हुई। आप इस छात्रा को अच्छे से जानते होंगे जिसे बदनाम करने की भरपूर कोशिशें आईटी सेल द्वारा की गई…सफुरा प्रेग्नेंट हैं और दो महीने से गिरफ्तार हैं।
उनकी गिरफ्तारी की एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स जैसे अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों द्वारा अत्यधिक निंदा की गई,

सफुरा ज़र्गर एक जामिया के समाजशास्त्र विभाग में शोध की छात्रा है । सफूरा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध जीसस एंड मैरी कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की वह पिंजरा तोड़ की सक्रिय सदस्य रही।

सफुरा ने भी एंटी-सीएए-एनआरसी आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था; वह JCC की संस्थापक सदस्य और मीडिया समन्वयक भी हैं। । दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ द्वारा पूछताछ के लिए बुलाए जाने के बाद 10 अप्रैल को सफूरा को गिरफ्तार किया गया था। उन्हें कई बार जमानत से वंचित किया गया है और उन्हें काले कानून यूएपीए के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि कई संगठनों ने जेल में गर्भावस्था के दौरान उसके स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताई है, लेकिन अदालत ने उसे जमानत देने से इंकार कर दिया है।

जामिया के छात्र नेताओं को गिरफ्तार किए जाने का सिलसिला यहीं नही रुका और जामिया के ओर छात्र आसिफ इक़बाल तन्हा को भी गिरफ्तार कर लिया गया… आसिफ इकबाल तन्हा, JMI में बीए फ़ारसी अध्ययन के अंतिम वर्ष का छात्र हैं।

16 मई को पूछताछ के लिए बुलाया गया था और दिल्ली पुलिस के विशेष सेल द्वारा शाम को गिरफ्तार किया गया। आसिफ झारखंड के हज़ियाबाग का रहने वाले है और जमात-ए-इस्लामी हिंद की युवा शाखा स्टूडेंट इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन (SIO) का सक्रिय सदस्य है। आसिफ़ पांच साल से SIO में काम कर रहे हैं…. वह विश्वविद्यालय में अपने पहले वर्ष से ही कैंपस की राजनीति में सक्रिय हैं। विश्वविद्यालय में छात्र संघ की स्थापना के लिए हुए हमलों में वह एक प्रमुख चेहरा थे। आसिफ ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के लापता छात्र नजीब अहमद के लिए न्याय की मांग करते हु आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी…वह शुरू से ही सही CAA-NRC के विरोध प्रदर्शनों में मौजूद थे, और 15 दिसंबर को विश्वविद्यालय के अंदर पुलिस हिंसा में गंभीर रूप से घायल भी हुए थे।

15 दिसंबर को जामिया में भड़की हिंसा में आरोपी आसिफ को गिरफ्तार कर लिया गया था। बाद में उन पर उत्तर-पूर्वी दिल्ली हिंसा में भाग लेने का आरोप लगाया गया और यूएपीए के तहत फिरसे गिरफ्तार कर लिया गया।

सवाल सिर्फ इन तीन छात्रों की गिरफ्तारी पर आकर नही रुक जाता है…..सवाल हर उस शख्स के लिए किया जाना चाहिए जो सरकार की बदले वाली नीति का शिकार हैं…फिर चाहे वो यूनाइटेड अगेंस्ट हेत के खालिद सैफी हो…जेएनयू छात्र शरजील इमाम हो या शिफा उर रहमान हों…या देश भर के विभिन्न हिस्सों से गिफ्तार किया जा रहा कोई भी छात्र हो।

सवाल ये भी किया जाना चाहिए कि आखिर “देश के गद्दारों को गोली मारो सालों को जैसा नारा लगाने वाले लोगों पर कार्यवाही कब होगी ? उन युवकों पर कार्यवाही कब होगी जिन्हें सरेआम दिल्ली की सड़कों पर गोली चलाते देखा गया…या कार्यबाही उनपर कब होगी जिन्होंने दिल्ली को दंगों की आग में झोंक दिया।
सवाल बहुत सारे हैं…कुछ हम पूछ रहे हैं कुछ आप पूछिए।

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