त्रिपुरा में मुस्लिम विरोधी हिंसा और दो रुख़ी संघी सरकार

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Image: Newslaundry

कहा जाता है कि नफ़रत मनुष्य से कुछ भी करवा सकती है। इंसान नफ़रत की आग में क्या कुछ अपराध कर बैठता है, उसे भी नहीं पता लगता।

नफ़रत बस एक इंसान के लिए इतनी ख़तरनाक साबित हो सकती है तो ज़रा सोचिए जब यही नफ़रत एक पूरी भीड़ या एक झुंड का रूप धारण कर ले तो परिणाम क्या हो सकता है! हमारे देश में पिछले कुछ वर्षों से नफ़रत का यह बाज़ार काफ़ी गर्म है।

धर्म के नाम पर नफ़रत की राजनीति अपने चरम पर है, जिसके कई बड़े उदाहरण वर्तमान में हमारे सामने हैं। चाहे दिल्ली दंगें हों या सीएए विरोधी आंदोलन की आड़ में छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारियां हों, धर्मांतरण के नाम पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ षड्यंत्र हों या असम में मुसलमानों पर ज़ुल्म हो। इन उदाहरणों में एक बात बहुत सामान्य है कि हर मामले की जड़ नफ़रत है जिसके द्वारा एक धर्म विशेष को निशाना बनाया जाता है। ऐसा ही कुछ बीते दिनों त्रिपुरा में हुआ। बांग्लादेश की सीमाओं से सटा यह राज्य बीते सप्ताह से हिंसा की चपेट में है।

क्या है पूरा मामला?

कुछ दिनों पहले बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के दौरान वहां के अल्पसंख्यक हिंदू समाज के ख़िलाफ़ हिंसा भड़क उठी जिसमें कुछ लोग मारे गए और कई घायल भी हुए। साथ ही कई मंदिरों पर हमले की भी ख़बरें सामने आईं लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार वहां प्रशासन द्वारा हिंसा फैलाने वालों के ख़िलाफ़ जल्द कारवाई भी हुई और कई गिरफ़्तारियां भी की गईं। लेकिन हिंसा की यह घटनाएं सिर्फ़ बांग्लादेश तक नहीं रुकीं बल्कि इसकी लपटें पड़ोसी देश तक भी पहुंचीं।

बांग्लादेश में हुई इस हिंसा के विरोध में त्रिपुरा में विश्व हिंदू परिषद् (वीएचपी), बजरंग दल, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) जैसे कई हिंदुत्ववादी संगठनों ने जगह-जगह पर रैलियां निकालनी शुरू कीं। लेकिन यही रैलियां जो बांग्लादेश में हिंदुओं के ख़िलाफ़ की गई हिंसा की निंदा में निकाली जा रहीं थीं, ख़ुद राज्य के मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध हिंसक हो गईं।

मुस्लिम बाहुल्य ज़िलों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया, मुसलमानों की दुकानों, मस्जिदों, घरों में तोड़-फोड़ व आगज़नी की गई तो कुछ स्थानों पर मुस्लिम महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की कोशिश भी की गई, कहीं मुसलमानों के घरों पर भगवा झंडे लहराए गए तो कहीं पवित्र क़ुरआन को जलाया गया, वहीं रैलियों के दौरान अनैतिक मुस्लिम विरोधी और हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) से संबंधित अपमानजनक नारे लगाए गए। अब तक कई अलग-अलग स्थानों पर तक़रीबन 15 मस्जिदों पर हमले हुए हैं, मुसलमानों की दर्जनों दुकानें तोड़ी गईं हैं, जिनमें नॉर्थ त्रिपुरा के रोवा पानी सागर, धर्मिनगर, उनाकोटी, कैलाशहर आदि इलाक़े शामिल हैं।

स्थानीय नागरिकों एवं पीड़ितों की मानें तो जब एक तरफ़ नॉर्थ त्रिपुरा में हिंसा चरम पर थी, खुलेआम दुकानों को तोड़ा जा रहा था, मस्जिदों को आग के हवाले किया जा रहा था, वहीं दूसरी ओर कई जगहों पर पुलिस की मौजूदगी में भी हिंसा हो रही थी। इस संबंध में जब पुलिस प्रशासन से सवाल किया गया तो जवाब में पुलिस ने कहा कि हिंसा करने वालों की तादाद पुलिस फ़ोर्स से बहुत ज़्यादा है। कहीं-कहीं यह भी सुनने को मिला कि लोगों की दुकानें जलाई जा रही हैं और पुलिस को सूचना देने के बाद भी जब तक पुलिस पहुंची तब तक दुकानें जल जातीं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुलिस प्रशासन और राज्य सरकार द्वारा इस हिंसा को बिल्कुल नज़रंदाज़ करने की कोशिश की जा रही थी।

जब हिंसा की लपटें राज्य में ज़्यादा तेज़ी से फैलने लगीं तो मुसलमानों द्वारा इस नफ़रत भरी हिंसा को रोकने के लिए एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित किया गया। इस दौरान वही पुलिस जो अपने आप को लाचार बता रही थी, अचानक से हरकत में आ गई और उस स्थान पर धारा 144 के तहत प्रदर्शन की इजाज़त नहीं दी गई, जबकि हिंसा करने वाले अब भी आज़ाद हैं। भाजपा शासित राज्यों में पुलिस और प्रशासन का यह दोगलापन कोई नई बात नहीं है।

26 अक्तूबर के दिन नॉर्थ त्रिपुरा के इलाक़े रुवा पानी सागर में तक़रीबन 8 हज़ार की तादाद में हिंदुत्ववादी संगठन के कार्यकर्ताओं की रैली निकलती है और ख़ूब धड़ल्ले से मुस्लिम विरोधी नारे लगाए जाते हैं और मस्जिदों को क्षति पहुंचाई जाती है। फ़ैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि एक मस्जिद को जलाया भी गया है, लेकिन उसी दिन त्रिपुरा पुलिस की ओर से ट्वीट किया जाता है कि पानी सागर में किसी भी धार्मिक स्थल को नुक़सान नहीं पहुंचाया गया है, जो लोग सोशल मीडिया पर अफ़वाहें फैला रहे हैं वे ऐसा न करें अन्यथा उनके ख़िलाफ़ सख़्त कारवाई होगी। उसी दिन पुलिस का एक और ट्वीट आता है जिसमें यह बताया जाता है कि स्थिति नियंत्रण में है। इससे ज़्यादा‌ दो रुख़ी बात और क्या हो सकती है कि एक तरफ़ जो वास्तव में दहशत का माहौल बना रहे हैं उनके लिए प्रशासन ख़ुद को लाचार व मजबूर दिखा रहा है और दूसरी तरफ़ जो सच्चाई दिखा रहे हैं उन्हें क़ानून पढ़ाया जा रहा है। ये वाक़ई “अच्छे दिन” हैं!

मीडिया की बात करें तो “गोदी मीडिया” के ये हाल हैं कि उनके लिए देशहित के मुद्दे ज़रूरी नहीं हैं। उनको देखते हुए ऐसा लगता है कि अब देश में मुद्दे बचे भी हैं या नहीं! मीडिया का एक छोटा हिस्सा जो ग्राउंड पर जा कर सच दिखाना भी चाह रहा था, उसे वहां जाने नहीं दिया जा रहा है और धमकियां दी जा रही हैं, ये है विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की हक़ीक़त!

बीते हफ़्ते से चल रही इस हिंसा को हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा पूर्व नियोजित तरीक़े से अंजाम दिया जा रहा था, तभी 29 अक्तूबर को पानी सागर की जामा मस्जिद कमेटी के अध्यक्ष द्वारा हिंसा से संबंधित दी गई अर्ज़ी को त्रिपुरा हाईकोर्ट ने मंज़ूर कर लिया और 10 नवंबर तक राज्य सरकार से हिंसा को लेकर विस्तृत जांच के साथ रिपोर्ट तलब की है। फ़ैक्ट फाइंडिंग द्वारा मिली सूचना के अनुसार अब जबकि हाईकोर्ट में अर्ज़ी मंज़ूर कर ली गई है उसके बाद प्रशासन कुछ हरकत में आया है और कुछ स्थानों पर मस्जिदों को जो नुक़सान हुआ है उसकी मरम्मत का काम शुरू किया गया है लेकिन अब भी काफ़ी इलाक़े हिंसा की ज़द में हैं और ख़स्ता हाली का शिकार हैं। उनाकोटी में धारा 144 लागू की गई है ताकि कोई भीड़ इकट्ठी न होने पाए और काफ़ी हद तक स्तिथि नियंत्रण में है।

लेकिन सवाल जस का तस बना हुआ है कि अगर प्रशासन चाहता तो क्या नहीं हो सकता था! अगर पहले हालात ख़राब होते ही राज्य में धारा 144 लागू कर दी जाती, पुलिस बल को तैयार कर लिया जाता तो शायद हिंसा इतनी नहीं भड़कती, लेकिन कहीं-न-कहीं यही महसूस होता है कि राज्य की भाजपा सरकार और संघी प्रशासन ने भी चुपचाप तमाशाई बन कर दंगाईयों का ख़ूब साथ दिया। जहां ज़रूरत नहीं थी वहां क़ानून का दिखावा किया गया और जहां वास्तव में ज़रूरत थी वहां लाचारगी और लापरवाही से काम लिया गया।

– सिद्दीक़ी मुहम्मद उवैस

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