कोरोना-पैंडेमिक: जब जनता ज्ञान की सत्ता में मानवीय मूल्यों का ह्रास देखती है, तब वह षड्यन्त्रों( कॉन्सपिरेसी-सिद्धान्तों ) में विश्वास कर बैठती है।

विज्ञान की ऐसी गूढ़ जानकारियों से अनभिज्ञ लोग अगर सीधे-सादे मनगढ़न्त कॉन्सपिरेसी-सिद्धान्तों में रमे हुए हैं , तो उनके भय और अविश्वास के मूल को समझने की ज़रूरत है। किसने उन्हें इतना डरा रखा है कि हर ज्ञानी-शोधरत को सन्देह की दृष्टि से देखते हुए , उसके निष्कर्षों को नकारते जा रहे हैं। क्या यह डर पश्चिम का है ? विज्ञान का है ? अथवा उद्योगपति का?

0
790

विश्व-परम्परा में ज्ञान-सत्ता को सदैव राजसत्ता से ऊपर माना जाता रहा है : संस्कृत-सुभाषित “विद्वत्वंच नृपत्वंच नैव तुल्यं कदाचन, स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते” में इसी व्यापक लोकहित का ध्वनन हो रहा है। जनता स्वाभाविक रूप से यह आशा करती है कि ज्ञान-साधकों में विवेक पैदा हो, वे मानवीय मूल्यों को भीतर स्थान दें और जनहित को सर्वोच्च रखते हुए अपने ज्ञान को लोक के लिए अर्पित करते जाएँ। जब यह नहीं होता दिखता, तब जनता ज्ञानियों पर सन्देह करने लगती है। आधुनिक समय में प्रचलित तमाम कॉन्सपिरेसी-सिद्धान्त जनता में पसरे ज्ञान-सन्देह का ही परिणाम हैं।

षड्यन्त्रों में विश्वास रखने के अभ्यस्त अनेक लोग यह मान रहे हैं कि कोरोना-विषाणु किसी प्रयोगशाला में किसी सरकार या उद्योगपति द्वारा बनाया गया है और फिर जाने-अनजाने यह समाज में फैल गया। कई लोग इसे जैविक अस्त्र मान रहे हैं और वे इसके लिए किये जा रहे वैक्सीन-निर्माण को प्रयासों को भी उद्योपतियों की मुनाफ़ा कमाने की तरक़ीब बता रहे हैं। समाज में इस तरह के कॉन्सपिरेसी-जीवियों में इतना अविश्वास कहाँ से आया, इसके लिए इतिहासकार सोफ़िया रोज़ेनफेल्ड की बातें ध्यान देने योग्य हैं, जिनका वर्णन वे अपनी पुस्तक ‘डेमोक्रेसी एण्ड ट्रुथ’ में करती हैं।

रोज़ेनफेल्ड कहती हैं कि शासकों और शासितों में जितना अन्तर बढ़ेगा , उतना कॉन्सपिरेसी-सिद्धान्त पनपेंगे। ज्ञानवान्, धनवान्, सत्तावान् — ये सभी शासकों के भिन्न-भिन्न प्रकार ही हैं। आधुनिक समय में इनका लोगों से सम्पर्क टूट गया है। जनता इन्हें स्वार्थी और अर्थलोलुप मानती है, इसीलिए वह इनकी बातों पर लगातार सन्देह करती जाती है। ऐसे में डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के तर्कपूर्ण शोधों के ऊपर वे तरजीह अपनी सुनी-पढ़ी अफवाहों, गलत-सलत मान्यताओं और सोशल मीडिया पर फैले भ्रमों को देते हैं। जो कॉन्स्पिरेसियों में जी रहे हैं, उनका मनोविज्ञान समझने की ज़रूरत है: किस कारण वे डरते-डरते ज्ञान, तर्क, शोध जैसे लोकहितकारी निर्भयी शब्दों से दूर चले गये ?

कोविड-19 नामक वर्त्तमान महामारी का विषाणु सार्स-सीओवी-2 (SARS-CoV 2) के नाम से जाना जाता है। पिछले साल चीन के वूहान शहर से इसका प्रसार आरम्भ हुआ और अब तक सत्तर से अधिक देशों के लोगों को यह संक्रमित कर चुका है। नेचर-मेडिसिन नामक सुख्यात जर्नल में प्रकाशित जानकारी के अनुसार यह विषाणु पूरी तरह से से प्राकृतिक है और इसे किसी लैब में किसी सरकार या उद्योगपति ने नहीं बनाया है।

क्रिस्टियन एंडरसन नामक वैज्ञानिक कोरोना-विषाणु के जीनोम ( आनुवांशिक सामग्री ) पर चर्चा करते हैं। वर्तमान कोरोना-विषाणु का जीनोम-सीक्वेंस-डेटा प्राकृतिक रूप से अस्तित्व में आया है और कृत्रिम तरीक़ों से नहीं बनाया गया है। ध्यान रहे कि कोरोना-विषाणुओं का एक बड़ा परिवार है, जिसमें अनेक विषाणु आते हैं। चीन में ही सन् 2003 ( सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिण्ड्रोम ) में सार्स और सऊदी अरब में सन् 2012 में फैला मर्स ( मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिण्ड्रोम ) भी इसी परिवार के विषाणुओं से होने वाले रोग थे। वर्तमान कोरोना-महामारी के आरम्भ में ही चीनी वैज्ञानिकों ने इस विषाणु के जेनेटिक-डेटा को सीक्वेंस करने में क़ामयाबी पा ली थी। तब-से एंडरसन और उनके साथी वैज्ञानिक इस कोरोना-विषाणु के उद्भव के विषय में लगातार शोध में लगे हुए हैं और उनके नतीजे यही हैं कि यह विषाणु पूरी तरह से प्राकृतिक रूप से मनुष्यों में आया है।

मानव-कोशिकाओं में प्रवेश से पहले यह कोरोना-विषाणु उनकी सतह पर ख़ास प्रोटीनों द्वारा चिपकता है ,जिन्हें स्पाइक प्रोटीन कहा गया है। इन प्रोटीनों का जो हिस्सा मानव-कोशिकाओं से सम्पर्क बनाता है, उसे रिसेप्टर-बाइंडिंग-डोमेन ( आरबीडी ) का नाम दिया गया है। यह चिपकाव इतना सटीक है कि इसे प्रयोगशालाओं में जेनेटिक इंजीनियरिंग द्वारा बनाया ही नहीं जा सकता — ऐसा वैज्ञानिक मानते हैं। यह तो प्रकृति में विकास के साथ ही पैदा हो सकता है।

यदि कोई वैज्ञानिक लैब में वायरस को बनाता है, तो वह किसी ऐसे वायरस की बैकबोन( आण्विक संरचना ) का इस्तेमाल करता है, जो पहले से मनुष्य में रोग पैदा करता रहा हो। किन्तु वर्तमान कोरोना-विषाणु की बैकबोन अन्य कोरोना-विषाणुओं से एकदम भिन्न है और चमगादड़ों और पैंगोलिनों के विषाणुओं से मेल खाती है। आरबीडी और बैकबोन की संरचना को देखकर यह मानना असम्भव है कि इस विषाणु का निर्माण किसी लैब में किया गया है।

विज्ञान की ऐसी गूढ़ जानकारियों से अनभिज्ञ लोग अगर सीधे-सादे मनगढ़न्त कॉन्सपिरेसी-सिद्धान्तों में रमे हुए हैं, तो उनके भय और अविश्वास के मूल को समझने की ज़रूरत है। किसने उन्हें इतना डरा रखा है कि हर ज्ञानी-शोधरत को सन्देह की दृष्टि से देखते हुए, उसके निष्कर्षों को नकारते जा रहे हैं। क्या यह डर पश्चिम का है? विज्ञान का है? अथवा उद्योगपति का?

ज्ञान-सत्ता पर सन्देह संसार के लिए सबसे बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण घटना है किन्तु ज्ञानी जनता पर इसका सम्पूर्ण दोष नहीं मढ़ सकते। यह अपराध तो ज्ञानी और जनता , सत्ताजीवी और सत्तासेवी , वैज्ञानिक-डॉक्टर और पब्लिक के बीच बराबर ही बँटेगा.

(Skand Shukla पेशे से डॉक्टर हैं, ये इनके अपने विचार हैं)

Skand Shukla

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here