दक्षिणपंथी लोकलुभावनवाद (पॉपुलिज़म) के उदय का रहस्य

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दक्षिणपंथी लोकलुभावनवाद (पॉपुलिज़म) के उदय का रहस्य

-आमिर रजा

लोकलुभावनवादी आंदोलनों का उदय, उत्थान और सफलता समकालीन वैश्विक राजनीति को परिभाषित करने वाली विशेषताएं हैं। उदार लोकतांत्रिक दृष्टिकोण के विरोधी होने के बावजूद, दुनिया भर के लोकलुभावनवादियों ने आश्चर्यजनक चुनावी सफलता प्राप्त की है। हालांकि ‘लोकलुभावनवाद’, इसके सटीक अर्थ पर आम सहमति की कमी के कारण एक विवादित शब्द बना हुआ है, परन्तु साहित्य में कुछ सहमति देखने को मिलती है जिसके अनुसार लोकलुभावन लामबंदी की सफलता मुख्य रूप से मतदाताओं को सरकार से जोड़ने वाली स्थापित पार्टियों और राजनीतिक आंदोलनों के व्यापक परित्याग से जुड़ी है। यह मौजूदा व्यवस्था के भ्रष्ट होने की धारणा को उत्तेजित करता है और एक वास्तविक न्यायपूर्ण समाज के पुनर्निर्माण के लिए सदगुणी “जनता” का समर्थन चाहता है। “जन-समर्थक” या “सत्ता-विरोधी” की शब्दावली आम तौर पर संस्थागत क्षय और चुनावी प्रोत्साहनों का उत्पाद है जहां नेतृत्व और मतदाताओं के बीच सीधा संबंध किसी भी अन्य कारकों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। हालांकि लोकलुभावनवाद वैचारिक वर्णक्रम में मौजूद है, उदार लोकतंत्र के लिए लोकलुभावनवादी खतरा बड़े पैमाने पर दक्षिणपंथ से आया है। दक्षिणपंथी लोकलुभावनवाद कहीं अधिक अलगाववादी होता है, जो अति-राष्ट्रवादी और अल्पसंख्यक विरोधी रवैया रखने वाले मतदाताओं से समर्थन प्राप्त करता है।

लोकलुभावनवाद लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है। फिर भी दुनिया भर में, सत्तावादी प्रवृत्ति वाले दक्षिणपंथी लोकलुभावनवादी लोगों को असाधारण स्तर की भागीदारी के साथ चुना जा रहा है। उदार लोकतंत्र में यह विरोधाभासी समय दर्शाता है कि लोकतंत्र का मार्ग हमेशा रैखिक नहीं होता है, और इतिहास के कुछ मुख्य बिंदुओं पर, लोकतंत्र घातक और भ्रष्ट राजनीतिक प्रवृत्तियों को भी फैलाता है, उनका समर्थन करता है और उन्हें वैधता प्रदान करता है। लोकतंत्र का वर्तमान अत्यंत उग्र चरण, राष्ट्रवाद के और भी अधिक उग्र चरण के साथ गठबंधन बना कर, बहुसंख्यक वर्गों की एकता का पक्ष लेता हुआ और विविधता के खिलाफ दृढ़ होता हुआ प्रतीत होता है, जिससे लोकतंत्र के संदिग्ध संतुलन को गंभीर खतरा है। लोकलुभावनवाद ने अपराधी की तलाश करके इस जटिल समस्या को और भी बढ़ा दिया है।

राजनीति शास्त्री एंटन पेलिंका के अनुसार दुश्मन विदेशी लोग, विदेशी संस्कृति- पहले ही राष्ट्र राज्य के किले में सेंध लगाने में सफल हो चुका है, इसके लिए कोई तो जिम्मेदार होगा। सांस्कृतिक विविधता को स्वीकार करने की उदारवादी लोकतांत्रिक नीतियों के लिए ज़िम्मेदार अभिजात वर्ग ही ” ’दूसरे’ को परिभाषित करने वाला समूह” हैं। अधिक से अधिक बहुलवादी समाज की जटिलताओं का लोकलुभावनवादी उत्तर बहुसंस्कृतिवाद नहीं है। दक्षिणपंथी लोकलुभावनवाद बहुसंस्कृतिवाद को एक समूह के राष्ट्र का अराष्ट्रीयकरण करने और उसके लोगों को विखंडित करने के नुस्खे के रूप में देखता है। इस प्रकार, “पीड़ित-अपराधी उत्क्रमण,” “बलि का बकरा,” वाली विवादित रणनीतियाँ और साजिशी-सिद्धांतों का निर्माण दक्षिणपंथी लोकलुभावनवादी कथानक के आवश्यक कल-पुर्ज़े हैं जो धीरे-धीरे फासीवाद के लिए बीजारोपण का उत्पादन कर सकते हैं।

भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों में, एक निर्वाचित दक्षिणपंथी नेता उस असंतोष को संगठित करता है जो समाजों के जातीय, धार्मिक और नस्लीय रूप से विविध होने के कारण पनपता है। मोहभंग की इस कहानी में, वे धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों को जोड़कर और “एक राष्ट्र, एक जनता और एक संस्कृति” का एक लोकलुभावनवादी रुख अपनाते हैं, जिससे उन्हें चुनावी लाभ प्राप्त होता है। लोकलुभावनवादियों द्वारा प्रोत्साहित, आबादी का एक बड़ा वर्ग मौजूदा अधिकारों और कानूनों को बहुसंख्यकों के हितों के लिए बाधाओं के रूप में देखता है और एक समावेशी समाज के बजाय जनता के कट्टरपंथी बदलाव का समर्थन करता है। 2014 के भारतीय आम चुनाव में, रूढ़िवादी भाजपा ने, जो लोकलुभावनवादी नेता नरेंद्र मोदी के करिश्मे पर बहुत अधिक निर्भर करती है, भारतीय मुसलमानों के बारे में इसी तरह के कथानक का प्रचार किया था।

इसके कई नेताओं ने मुसलमानों पर हिंदुओं के साथ बलात्कार और हत्या करने का आरोप लगाया और हिंदुओं को चुनाव में बदला लेने के लिए प्रेरित किया। असम में एक चुनाव अभियान के दौरान, मोदी ने 30 मुसलमानों, जो कथित रूप से बांग्लादेश से आकर बसे थे, के नरसंहार के परिप्रेक्ष्य में एक जनसभा को संबोधित किया, और हिंदू मतदाताओं को यह कहकर लुभाया कि उनके सत्ता में आते ही अप्रवासियों को बैग उठा कर जाना पड़ेगा। भारत को एक हिंदू राज्य बनाने के उनके वादे ने भारतीय राजनीतिक परिदृश्य की धर्मनिरपेक्षता और मंडल राजनीति की पिछली मुख्यधारा से एक कट्टरपंथी प्रस्थान की ओर प्रतिनिधित्व किया। इस तरह के अल्पसंख्यक विरोधी कथानक का मूल आधार राष्ट्र-राज्य की दक्षिणपंथी लोकलुभावन अवधारणा में एक जातीय-राष्ट्रीय इकाई के रूप में निहित है जो जनता द्वारा परिभाषित भी है और ‘जन’ को परिभाषित भी करता है।

विभाजनकारी दोहरेपन पर आधारित यह स्पष्ट अवधारणा लोगों को “हम” और “उन्हें” में विभाजित करती है जहाँ “हम” का अर्थ स्वदेशी, शुद्ध और एक राष्ट्रवादी है, जबकि “उन्हें” का मतलब अन्य, देशद्रोही और मिश्रित है। इस प्रकार धर्म और राष्ट्रवाद बहुसंख्यकों की निर्मित सामूहिक आहत भावनाओं को संबोधित करके और बढ़ा-चढ़ाकर दक्षिणपंथी भावनात्मक शासन को स्थिरता प्रदान करते हैं। राष्ट्र को महान बनाने की इच्छा का दावा बहुसंख्यकों द्वारा सीधे तौर पर अपरिष्कृत जातीय श्रेष्ठतावाद है। देश को महान बनाने के असंख्य दावों में एक अंतर्निहित विद्वेष, जातिवाद और सांप्रदायिकता विद्यमान है।

देश को पुनः महान बनाने और ‘नया भारत’ बनाने का विचार आम तौर पर सामूहिक उदासीनता से जुड़ा होता है, और दक्षिणपंथी लोकलुभावनवादी अक्सर उस गौरवशाली अतीत की वापसी का वादा करते हैं जो सामाजिक समस्याओं के समाधान के रूप में देखा जाता है। साथ ही, पुरानी यादों का इस्तेमाल ऐतिहासिक शिकार के कथानक को प्रसारित करने और समकालीन आत्म-उत्पीड़न के कथानक को तेज करने के लिए भी किया जा रहा है। अतीत के स्वर्ण युग, जिसे राष्ट्र और लोगों से छीन लिया गया था, के विचार की भाषाशैली प्रयोग करते हुए, लोकलुभावनवादी एक ऐतिहासिक चेतना को निर्मित करते हैं तथा अपनी राजनीतिक प्रगति के लिए इतिहास के पाठ्यक्रम को बदलते हैं ताकि लोगों को “पीड़ित स्थिति” का काल्पनिक एहसास हो सके। स्मृति निर्माण संरचना, जिसमें भय और गर्व के तत्व शामिल हैं, लोकलुभावनवादी नेताओं को खुद को एक ऐसे ऐतिहासिक कारक या मसीहा के रूप में चित्रित करने में सक्षम बनाता है जो एक राष्ट्र और उसके लोगों के सामूहिक भविष्य को बदलने में सक्षम हैं।

अत्यधिक प्रतिस्पर्धी नवउदारवादी दुनिया में, भय सार्वजनिक क्षेत्र के प्रमुख पहलुओं में से एक बन गया है। हमारे समाज के बड़े पैमाने पर मीडिया-करण ने भय के निरंतर प्रसार के द्वारा व्यक्तिगत कल्पना को भय से भर दिया है, और सोशल मीडिया की सर्वव्यापकता ने व्यक्तियों को उनके काल्पनिक कक्षों में ग्रसित कर रखा है, जहां उनके डर का कुल योग फेसबुक पर नकली पोस्टों, रीट्वीट की संख्या और WhatsApp संदेशों की संख्या के साथ तेजी से फैलता है। बड़े कॉर्पोरेट घरानों की मदद से मीडिया के माध्यम से समाज के इस परिवर्तन ने राजनीतिक प्रक्रियाओं की तुलना में राजनीति के व्यक्तिगत, मीडिया-प्रेमी प्रदर्शनों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया है, जो धीरे-धीरे राजनीति के काल्पनिकीकरण की ओर ले गया और राजनीति में वास्तविक और अवास्तविक; सूचनात्मक और मनोरंजक के बीच की सीमाओं को धुंधला कर दिया। यह दर्शकों के लिए एक नई वास्तविकता पैदा करता है, जो समकालीन समाज की बहुत जटिलताओं और बहुलवाद के विपरीत एक भ्रामक सरल कल्पनात्मक चित्र प्रस्तुत करता है।

‘स्वयं’ और ‘दूसरे’  की बड़े पैमाने की मिडियाकृत व वस्तुकृत  छवियों का प्रवाह दोगलेपन का एक बढ़ता हुआ ऐसा संग्रह बनाता है जो सामूहिक पहचान के किनारों की स्थिर सीमाओं को अस्थिर कर देता है, और बहुसंख्यकों को हमेशा अल्पसंख्यक (संख्यात्मक या सांस्कृतिक रूप से) बन जाने का भय दिलाता रहता है और यह डर दिखाता है कि अल्पसंख्यक कुछ समय में बहुसंख्यक बन जाएंगे। बहुसंख्यकों के इस भय, चिंता और असुरक्षा को चतुराई से दक्षिणपंथी लोकलुभावनवादियों द्वारा हथिया लिया जाता है, जो संकट और हिंसा के हथकंडे से मतदाताओं को लामबंद करते हैं। अल्पसंख्यकों का अस्तित्व इन समस्याओं और हथकंडे का एक महत्वपूर्ण पहलू है।

दक्षिणपंथी लोकलुभावनवाद की अवधारणा की परिभाषा इसके समर्थकों द्वारा सुरक्षा के साधन के रूप में की जाती है, परन्तु यह समाज में असुरक्षा का पोषण करता है। यह शक्ति की कल्पना परन्तु नपुंसकता के भय का रोपण करता है। बहुसंख्यकों के बीच दक्षिणपंथी पुरुषवादी राष्ट्रवाद के प्रसार के मूल में पुरुषवादी व्यग्रता की गहरी भावना है, जिसका दावा है कि यह एक मर्दवादी जागृति के माध्यम से हल किया जाएगा, जो अक्सर एक सैन्य जागृति में परिवर्तित हो जाता है। अप्रवासियों और अल्पसंख्यकों का यौन उद्वेग और गहरी हीनभावना ही दक्षिणपंथी लोकलुभावनवाद की वर्चस्ववादी मर्दानगी की उत्पत्ति है का मुख्य कारक है। पुरुषवादी चित्रांकन भी दक्षिणपंथी नेताओं की सफलता, अलंकारिक शैली और प्रदर्शनकारी कथानक में अत्यधिक प्रदर्शित और प्रासंगिक है। यह चित्रांकन पुरुषों को अपील करता है क्योंकि यह उस वास्तविकता के समक्ष जो हार की भविष्यवाणी करती है और उन लोगों को निष्कासित करने का वादा करती है जिन्होंने उन्हें दबा कर रखा था, स्वयं उनकी लिंग भावना की पुष्टि करता है।

दक्षिणपंथी लोकलुभावनवाद के परिणामस्वरूप लोकतंत्र का अधिक पतन हुआ है, एक नए “कल्पित लोकतंत्र” का पुनरुत्पादन किया गया है जिसमें नेतागण कमजोर अल्पसंख्यकों के खिलाफ नसली विनाश और नरसंहार करने के लिए बहुसंख्यकों द्वारा कानूनी रूप से चुने जाते हैं। भारत जैसे लोकतंत्र को वर्तमान में अन्याय, विद्वेष और अंततः हिंसा को बढ़ावा देने के लिए उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। हालाँकि, चुनावी लोकतंत्र जीवित रहेगा क्योंकि “लोकप्रिय इच्छा” की प्राथमिकता ने ही लोकलुभावनवादियों को वैधता प्रदान की है और इसे मतपेटी के माध्यम से सुरक्षित किया है, लेकिन जो दांव पर लगा है वह लोकतंत्र के एक ठोस स्थान का विचार है जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर डाल दिए गए सामाजिक, नसलीय और जातिगत पहचानों के सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक कल्याण की वकालत करता है। वास्तविक समानता का निरंतर क्षरण प्रतिबंधित लोकतंत्र, विशेषाधिकार और बहिष्करणीय विकास की पारंपरिक स्थिति की क्रमिक वापसी को प्रदर्शित कर रहा है।

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