[दर्पण] कितना अच्छा होता

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कितना अच्छा होता,
निकाल लेते सारा पोटेशियम नाइट्रेट बारूद से,
और ज़्यादा बना सकते थे उर्वरक,
पिघला देते हथियारों का सारा लोहा,
और अधिक बना सकते थे हल,
निकाल देते सारी नफ़रत ज़हन से,
और बेहतर बना सकते थे दुनिया,
कितना अच्छा होता!

कितना खौफ़नाक है कि वे हैं
जिन्हें चाहिए अहर्निश पतझर
जिन्हें सींचने हैं दरख़्त ख़ून से
जिन्हें बन्दूक से जोतने हैं खेत
जिनके पेट में भी है दिमाग
जिनकी आँखों में नहीं हैं रंग
जिनके सारे मंज़र तोप की नली के दूसरी ओर हैं,
कितना खौफ़नाक है कि वे हैं!

– अंकित काव्यांश

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