लघुकथा:सरकार की नीति

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” आइए मित्तल साहब …
बैठिए , बैठिए …
सब खैरियत ? “
” साहब ! ….
वो टैक्स वाला मामला सेटल हो जाता तो … “
” हो जाएगा मित्तल साहब …
आप इतने परेशान क्योँ हो रहे हैं ?…
मैं हूँ ना … ! “
” क्या कहें साहब …
एक तो माल स्टॉक रह रहा …
फैक्ट्री में आए दिन यूनियनवाजी का शोर दिमाग खराब करता है …
ऊपर से सरकार की नीति …
एक टैक्स भरूँ तो दूसरा सिर पर ..
मानसिक रूप से बहुत परेशान रह रहा हूँ आजकल ! “
” सही कह रहे हैं मित्तल साहब …
यह सरकार वाकई सही काम नहीं कर रही है …
इसे गरीबों और छोटे तथा मध्यम स्तर के व्यापारों – उद्योगों के लिए कोई बेहतर नीति लानी चाहिए …
इसके बदले यह सरकार बड़े व्यापारियों – उद्योगपतियों को बेवजह तंग कर रही है । “
वाणिज्य कर विभाग के असिस्टेंट कमिश्नर साहब , मित्तल साहब के द्वारा लाए गए नोटों के भरे बैग को टेबल के नीचे रखते हुए बोले ।

✍️डॉ अभिषेक कुमार

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