यूपी विधानसभा चुनाव में कहाँ खड़े हैं मुसलमान?

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चुनाव आयोग द्वारा पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही ‘उत्तर प्रदेश’ देश के राजनीतिक पटल पर तवज्जो का केंद्र बन गया है।

मीडिया में इस समय केवल यूपी चुनाव की चर्चा छाई रहती है और हो भी क्यों न! कहा जाता है दिल्ली की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर गुज़रता है।

यानि उत्तर प्रदेश की राजनीति पर ही केंद्र की राजनीति टिकी है। इसीलिए हर सियासी पार्टी उत्तर प्रदेश के सियासी मैदान में किसी भी क़ीमत पर बाज़ी अपने हाथ में करने के इरादे से उतर चुकी है। पिछले चुनाव की तरह ही सांप्रदायिकता और धर्म को हथियार बनाकर चुनाव जीतने के इरादे से उतरी सत्तारूढ़ बीजेपी को मुस्तैदी से जवाब देने के लिए विपक्षी पार्टियां भी अलग-अलग मुद्दे उठाकर बीजेपी पर वार करने को तैयार हैं। जहां कांग्रेस युवाओं, महिलाओं और शोषितों के मुद्दों व महंगाई और बेरोज़गारी को लेकर मैदान में है, वहीं अखिलेश यादव छोटे-छोटे मगर प्रभाव रखने वाले क्षेत्रीय दलों को साथ मिलाकर बीजेपी के समीकरण को बिगाड़ने की फ़िराक़ में हैं। लेकिन इस चुनावी रण में यूपी का मुस्लिम समुदाय अभी भी उलझन में है।

दरअसल 2014 के बाद से बदले सियासी समीकरण में वह ख़ुद को ठगा-सा महसूस कर रहा है और चुनाव की तारीख़ सिर पर आ जाने के बावजूद वह अभी तक यह तय नहीं कर पा रहा है कि वह किस ओर जाए। देश की कुल आबादी में मुसलमानों की संख्या लगभग 14 से 15 प्रतिशत है। मुस्लिम समुदाय देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है और उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में मुस्लिम समुदाय 20 प्रतिशत है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में हमेशा से मुस्लिम कार्ड ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

लेकिन दिनों-दिन राजनीतिक दलों द्वारा मुस्लिम वोटों को अपने पाले में करने के बढ़ते लोभ ने आज इस समुदाय के वोट को निरर्थक बना डाला है, जिसकी नज़ीर 2017 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिली। बीजेपी ने इस चुनाव में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया, इसके बावजूद पार्टी को 310 सीटें हासिल हुईं। सभी दलों के 86 फ़ीसदी मुस्लिम उम्मीदवार बीजेपी के उम्मीदवारों से हार गए। बीजेपी की इस जीत ने मुस्लिम वोट के महत्व पर बुरा प्रभाव डाला। वहीं पूरे प्रदेश में केवल 24 मुस्लिम उम्मीदवार जीते, जो 1991 के 23 सीटों के बाद विधानसभा में सबसे कम संख्या थी। उससे पहले 2012 के चुनाव में 403 सीटों वाले विधानसभा चुनाव में 69 मुस्लिम उम्मीदवार चुन कर आए थे, जो अब तक का रिकॉर्ड है।

इस चुनाव के बाद पंचायत से लेकर विधानसभा और संसद तक मुस्लिम प्रतिनिधित्व घटा है। एक सोच यह है कि सियासी पार्टियां अब मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने से संकोच करती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनकी जीत के आसार कम होते हैं।

जहां तक मुस्लिम पार्टियों की बात है, साल 2012 में पीस पार्टी ने चार सीटें जीती। उससे पहले साल 1996 और 2002 में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने की कोशिश की, लेकिन उसे कोई सीट नहीं मिली। इस पार्टी की शुरुआत 1995 में अरशद ख़ान ने की थी। साल 2017 में प्रदेश की राजनीति में असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने एंट्री ली। पार्टी ने स्थानीय निकाय के चुनाव में जिन 38 सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से वो एक भी सीट नहीं जीत पाई। विधानसभा के इन चुनावों में पार्टी 100 सीटों पर लड़ने का सोच रही है। लेकिन एआईएमआईएम भी मुस्लिम समुदाय पूरी तरह से भरोसा जीतने में कामयाब नज़र नहीं आ रही है। कुछ लोग यह मानते हैं कि इसे समर्थन देने से बीजेपी को सीधा फ़ायदा मिलेगा।

यूं तो मुस्लिम समुदाय के हितों पर किसी भी सत्तारुढ़ पार्टी ने कोई काम नहीं किया और ना ही कभी इस समुदाय की समस्याओं पर बात हुई लेकिन प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनते ही मुस्लिमों में असुरक्षा की भावना पैदा हो गई। धीरे-धीरे उनका यह डर सच भी साबित होने लगा। बीजेपी के इस शासनकाल में प्रदेश में कई ऐसी घटनाएं घटित हुईं जिसमें मुस्लिमों को सीधे तौर पर टारगेट किया गया।

कानपुर की घटना का वह वायरल वीडियो शायद ही किसी के ज़हन से मिटा हो जिसमें एक व्यक्ति को अफ़सर द्वारा पीटा जा रहा था और जय श्री राम जबरन बुलवाने की कोशिश की जा रही थी और उसकी सात साल की बेटी उससे लिपटकर रोते हुए उसे बचाने की कोशिश कर रही थी।

मथुरा में एक मुस्लिम डोसा बेचने वाले की केवल इसीलिए पिटाई कर दी गई कि वह कैसे हिंदू नाम से दुकान चला सकता है। मुज़फ्फरनगर में हिंदू महिलाओं से एक हिंदू कट्टरपंथी संगठन ने यह अपील की कि वे मुस्लिमों से मेंहदी ना लगवाएं। कोरोना काल में लगे लॉकडाउन के दौरान मुस्लिम सब्ज़ी बेचने वालों का बॉयकाट करने की अपील की गई। इस प्रकार की ढेरों घटनाएं 2017 के बाद से उत्तर प्रदेश में घटित हुईं और इससे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश की गई। इसका सीधा असर अब समाज में देखने को मिलता है। दोनों समुदायों के बीच नफ़रत की खाई दिन-प्रतिदिन गहरी होती जा रही है और इसका ख़ामियाज़ा सीधे तौर पर मुस्लिमों को भुगतना पड़ रहा है।

साल 2019 में एक वेबसाइट फ़ैक्टचेकर के मुताबिक़ गुज़रे 10 सालों में पूरे भारत में रिकॉर्ड किए गए हेट क्राइम के कुल मामलों में से 59 प्रतिशत मामलों में पीड़ित मुसलमान थे। नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफ़िस (एनएसओ) ने पिछले साल अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि मुसलमान कई प्रमुख क्षेत्रों में पहले से भी ज़्यादा पिछड़ गए हैं।

इस समय यूपी की 143 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटर्स का असर है। क़रीब 70 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम आबादी 20 से 30 प्रतिशत के बीच है। 43 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 30 फ़ीसदी से ज़्यादा है। यूपी की 36 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम प्रत्याशी अपने बूते जीत हासिल कर सकते हैं।

ऐसे में इस बार मुस्लिम समुदाय को समझ-बूझ के साथ तय करना होगा कि उसे किस प्रकार अपने वोट का इस्तेमाल करना है। अगर मुस्लिम समाज चाहे तो ‘उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समाज में बढ़ती असुरक्षा’ इस चुनाव में प्रमुख मुद्दा बन सकता है।

– सहीफ़ा ख़ान

(स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार)

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