हिजाब विवाद पर बोलीं मुस्लिम छात्राएं, कहा – हिजाब हमारी ‘मर्ज़ी’ है ‘मजबूरी’ नहीं

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“हमारा समाज टीवी और मीडिया के इशारों पर चलता है जो कहते हैं कि अगर आप हिजाब के समर्थन में हैं तो ये लड़कियों के साथ ज़ुल्म है। ऐसी बातों के माध्यम से समाज में ज़हर और भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं और मुस्लिम विरोधी विचारधारा को बढ़ावा दिया जा रहा है।

यही वजह है कि आज हिजाब पहनने वाली लड़कियों को सामाजिक, शैक्षणिक और अन्य बहुत से क्षेत्रों में कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।”

ये विचार छात्र विमर्श द्वारा आयोजित ऑनलाइन विचार गोष्ठी में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की पूर्व छात्रा और न्यूज़लॉंड्री की पत्रकार तस्नीम फ़ातिमा ने रखे।

हिजाब एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। कर्नाटक के एक सरकारी कॉलेज से उठा यह मुद्दा मात्र कर्नाटक राज्य तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि अब पूरे देश में हिजाब के संबंध में एक विवादित माहौल बना चुका है।‌ इसी मुद्दे पर छात्र विमर्श ने बीते बुधवार हिंदुस्तान के अलग-अलग विश्वविद्यालयों की हिजाब धारण करने वाली उन छात्राओं को आमंत्रित किया जो विशेष तौर पर अपनी वक्तृत्व कला के साथ राष्ट्रीय स्तर पर अपने विश्वविद्यालयों का प्रतिनिधित्व करती हैं और उनके साथ एक ऑनलाइन विचार गोष्ठी का आयोजन किया।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया की पूर्व छात्रा तस्नीम फ़ातिमा ने अपनी बात रखते हुए कहा कि “हिजाब पहनना हमारा संवैधानिक अधिकार है। इस देश में मुस्लिम लड़कियां धार्मिक आज़ादी का उतना ही अधिकार रखती हैं जितना किसी और धर्म की महिलाओं के पास है। समाज में यह पूर्वाग्रह बनाया गया है कि हिजाब ग़ुलामी की पहचान है और यह हमें असहाय और कमज़ोर बनाता है। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। हिजाब पहनकर हम मुस्लिम लड़कियां दूसरों से ज़्यादा ख़ुद को सुरक्षित महसूस करती हैं। आज भी हिंदुस्तान के अलग-अलग हिस्सों में हिजाब पहनकर हम आज़ादी के साथ अपना काम कर रहे है।”

आगे वह कहती हैं कि, “जिस समाज में साड़ी, कुर्ता, सलवार और बिंदी पर कोई सवाल नहीं होता तो फिर हिजाब पर ही सवाल क्यों किया जाता है? हिजाब हमारे धर्म का हिस्सा है। हम हिजाब में ख़ुद को सुरक्षित महसूस करते हैं और संविधान हमें इसे पहनने की आज़ादी देता है। मैं सलाम करती हूं उडुपी की लड़कियों को जिन्होंने अपने अधिकार को पहचाना।”

चंडीगढ़ विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा सकीना मीर अपनी बात रखते हुए कहती हैं कि, “मुझे हैरानी होती है कि हिजाब पहनने की वजह से लड़कियों को स्कूल में जाने से रोका जा रहा है। ये नफ़रत का ज़हर है जो समाज को नष्ट कर रहा है और इसे हमें जड़ से ख़त्म करने की ज़रूरत है।”

उन्होंने चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा कि, “आज के युवाओं को ग़लत रास्ते पर भेजा जा रहा है। उनके दिमाग़ इस्लाम और मुसलमानों के प्रति नफ़रत भरी जा रही है और ये उनकी ग़लती नहीं है। सवाल ये है कि उनके मन में ये चीज़े कहां से आ रही हैं? और जहां कहीं से भी आ रही हैं, हमें उसे समाप्त करने की ज़रूरत है।”

दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा सोबिया नबी को पब्लिक स्पीकर के रूप में पहचाना जाता है।‌ उन्होंने हिजाब के साथ ही हिंदुस्तान भर में अलग-अलग वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया है और कई सारे पुरस्कार अपने नाम किए हैं। अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि, “हिजाब की वजह से आज तक मुझे किसी भी स्टेज पर कभी-भी किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा और न ही इससे पहले कभी हिजाब का मामला सामने आया था।”

सोबिया राजनीतिक पार्टियों को इसका ज़िम्मेदार बताते हुए सवाल करती हैं कि, “आख़िर चुनाव के समय ही ऐसा मुद्दा क्यों उठाया गया?” उन्होंने कहा कि, “इसे एक राजनीतिक मामला बनाया जा रहा है क्योंकि आज से पहले कभी हिजाब को लेकर कोई समस्या नहीं हुई थी।”

आपको बता दें कि कर्नाटक में आने वाले दिनों में चुनाव होने हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश समेत अन्य कई राज्यों में चुनाव चल रहे हैं। ऐसे में सत्ता पक्ष द्वारा हिजाब के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना और राजनीति करना कोई अचरज की बात नहीं नज़र आती है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की शोध छात्रा हिबा अहमद ने अपने वक्तव्य में कहा कि, “सरकारी स्कूलों पर भी राजनीतिक लोगों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है जिसकी वजह से शैक्षणिक संस्थानों में एक विशेष विचारधारा को थोपने की कोशिश की जा रही है।”

उन्होंने कर्नाटक के मुख्यमंत्री द्वारा दिये गये बयान की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि, “हिजाब मुस्लिम समाज के पुराने रिवाज का हिस्सा है और हमेशा से मुस्लिम महिलाएं हिजाब करती रही हैं। ऐसे में यह कहना अनुचित है कि हिजाब अभी कुछ दिनों पहले ही पहनना शुरू हुआ है।”

उन्होंने फ़ातिमा शेख़ और सावित्री बाई फुले का उदाहरण देते हुए कहा कि, “उन्होंने भी हमेशा अपने सर को छुपाया है और सर को छुपाना, घूंघट करना या नक़ाब पहनना भारतीय परंपरा का हिस्सा है।”

उन्होंने कहा कि, “मुस्लिम लड़कियों को शिक्षा से दूर रखने की साज़िश की जा रही है, यह हमें समझने की जरूरत है। क्योंकि नक़ाब पहनना कोई नई बात नहीं है लेकिन गेरुआ रंग का शॉल पहनना और उसको लेकर हंगामा करना ज़रूर नई बात है।”

उन्होंनें वहां के हिंदुत्वादी गुटों पर सवाल करते हुए कहा कि, “छात्रों को गेरुआ रंग का शॉल पहनने के लिए किसने दिया? और जिन लोगों ने दिया उनका संबंध किन पार्टियों से है? यह सवाल पूछा जाना चाहिए।”

जम्मू-कश्मीर के डोडा की रहने वाली इफ़रा बतूल भी एक पब्लिक स्पीकर हैं और इस मैदान में उन्होंने अपनी अच्छी पहचान बनाई है। अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि, “हिजाब की वजह से हमारे आत्मविश्वास पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता बल्कि यह हमारे आत्मविश्वास को और शक्ति प्रदान करता है और उस लड़की (मुस्कान जिसकी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है) ने यह बात साबित कर दी कि सैकड़ों भगवाधारी गुंडों के बीच में भी उसने नक़ाब पहने हुए अल्लाहु अकबर के ज़रिए अपना बचाव किया।”

“मैं लॉ की छात्रा हूं और मुझे आज तक हिजाब की वजह से किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा लेकिन अक्सर लोग सवाल ज़रूर करते थे कि आप हिजाब क्यों पहनती हैं और उसे क्या फ़ायदा मिलता है?”, ऐसा कहना है सुमैया रोशन का जो गर्ल्स इस्लामिक ऑर्गेनाइज़ेशन कर्नाटक की प्रदेश अध्यक्ष हैं।

उन्होंने कर्नाटक की ज़मीनी हक़ीक़त से लोगों को रूबरू करते हुए बताया कि, “आज से पहले भी ऐसे मामले हुए लेकिन स्कूल प्रशासन और बच्चों के परिवार के लोगों ने मिलकर बातचीत के माध्यम से इसका हल निकाला था। लेकिन उडुपी का मामला बहुत ज़्यादा इसीलिए बढ़ गया क्योंकि इसे राजनीतिक रंग दिया गया जिसकी वजह से अब यह मामला और कई कॉलेजों में पहुंच चुका है।”

सुमैया रोशन ने लोगों से अपील की है कि सभी लोग एक साथ आएं और मुस्लिम छात्रों के साथ होने वाले अन्याय और शिक्षा से रोकने की साज़िश के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएं। उन्होंने बताया कि इस मामले में वहां के कई दूसरे संगठनों ने भी उनका साथ दिया है और वे सब साथ मिलकर इस लड़ाई को लड़ रहे हैं।

कर्नाटक के उडुपी से आने वाली आमना कौसर ने भी वहां की ज़मीनी हक़ीक़त पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि, “इसे राजनीति से जोड़ा जा रहा है जबकि हिजाब पहनना कोई मुद्दा नहीं है क्योंकि लड़कियां हमेशा से ही हिजाब पहनती आ रही हैं और यह उनका संवैधानिक अधिकार है।”

विचार गोष्ठी का समापन करते हुए छात्र विमर्श के संपादक मंडल की सदस्य सिमरा अंसारी ने कहा कि, “हम उन सभी संघर्षरत लड़कियों के साथ हैं, सिर्फ़ इसीलिए नहीं कि वे मुसलमान हैं बल्कि इसीलिए भी कि वे भारतीय हैं और भारत का संविधान हर किसी को आज़ादी के साथ अपने धर्म पर चलने की, अपनी मर्ज़ी से पहनने की और खाने की आज़ादी देता है।”

रिपोर्ट: एमडी स्वालेह अंसारी

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