देश मे चलता उत्तेजनात्मक राजनीतिक खेल और मुसलमान

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लेख: मिर्ज़ा हमज़ा बैग
अंग्रेजी से अनुवाद: बुशरा रहमान

भारत में मुस्लिम समुदाय हिंसा, भेदभाव, अथवा न्यूज़ चैनलों की पक्षपात चर्चाओं जैसी अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ है। वर्तमान दिनों में इस पक्षपात व्यवहार में आई तेज़ी के कारण घरों को ढाये जाना, हिंसा और हेट स्पीच जैसे मामलों में तीव्रता देखी गई है। मुसलमानों के विरुद्ध एक उत्तेजित वातावरण बनाया जा चुका है वर्तमान में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से जानबूझकर धार्मिक जुलूस को निकालना, जुलूस में उत्तेजित करने वाले मुस्लिम विरोधी गाने,भाषण, नारे,संगीत आदि चलाना आदि परिणाम वश दोनों समुदायों के बीच झगड़े की स्थिति पैदा होना यह आज एक सामान्य सी बात है गई है। इससे एसा प्रतीत होता है जैसे जुलूस में चलते संगीत आस्था की बजाय हिंदू समुदाय को प्राप्त होती शक्ति को दर्शाने के लिए चलाए जा रहे हैं ये दर्शाने के लिए कि हिंदू समुदाय कभी भी अपनी इच्छा से मुस्लिम बहुल क्षेत्र में घुस सकता है। मस्जिद के बाहर संगीत केवल लोगों को उत्तेजित करने के लिए चलाया जाता है। निरंतर होते मुसलमानों पर यह हमले यह सवाल उठाते हैं कि आख़िर हर घटना में पालन होता यह एक ही पैटर्न क्या दर्शा रहा है? इन जैसी घटनाओं और चुनौतियों से लड़ने के लिए आवश्यक है कि पहले इन घटनाओं के पीछे छिपे कारण की जानकारी हो।

हमें स्पष्ट रूप से यह पता है कि भाजपा के राजनीतिक स्पेक्ट्रम में मुसलमान केंद्र पर हैं। भारतीय राजनीति के परिणामों ने अनेक बार साबित किया है कि बीजेपी ने घ्रणा की इस खेती से कई फैसलें काटीं हैं। मुस्लिम विरोधी एजेंडा इतना प्रबल होता है कि वह दूसरे एजंडों के मुक़ाबले में सबसे अधिक वोटर खींच ले जाता है। इसलिए इस्लामोफोबिया न केवल उनकी वैचारिक आवश्यकता है बल्कि उनके लिए एक राजनीतिक आवश्यकता है। 2014 से सरकार में आने के बाद भाजपा ने कई मिथों को बढ़ावा दिया है; जैसे ‘हिंदू ख़तरे में है’; ‘अगर मुसलमानों की आबादी बढ़ गई तो वो हिंदुओं की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लेंगे’; ‘मुसलमान भले ही 20% है लेकिन वह 20% में भी एक अनूठी शक्ति रखते हैं’ इस तरह के कई और मिथों को बहुत तीव्रता के साथ सरकारी स्तर पर फैलाया गया है।

मुद्दसिर खान का परिवार 27 फरवरी, 2020 को दिल्ली के दंगा प्रभावित इलाक़े में उनकी मौत पर शोक मना रहा है।
(तस्वीर : दी स्क्रोल)

इस्लाम के शांतिपूर्ण स्वभाव को चुनौती देते हुए मुसलमानों को विलेन और चरमपंथी दर्शाया गया उन्हें असहनीय,आक्रामक और ऐसे विघटनकारी के रूप में दर्शाया गया जो सामाजिक शांति को बिगड़ने के लिए दंगा कराते हैं। यह वह तरीक़ा है जिसके द्वारा भाजपा समाज को धार्मिक बुनियादों पर विभाजित करती है, और राजनीतिक लाभ हासिल कर अपने वोट बैंक को सुरक्षित करती है।

भावनात्मक विचारों को समाज के हर कोने में व्यवस्थित रूप से फैलाया गया; निर्माण होने वाला नया समाज इन आधार पर ही निर्मित हो रहा है। इन विचारों को फैलाने में फिल्में, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया, साहित्य आदि ने पूरा पूरा योगदान देते हुए मुस्लिम विरोधी भावनाओं को समाज में बढ़ाने का काम क्या है। पूरी तरह से यह भी नहीं कहा जा सकता कि इस हिंसा में सफलता का कारण सिर्फ यही है, बल्कि एक महत्वपूर्ण कारण मुसलमानों में जागरूकता की कमी भी है क्योंकि जागरूक न होने के कारण ही मुसलमान उन हथकण्डों का शिकार होते हैं जो उन्हें टार्गेट करने के लिए बनाए जाते हैं।

वर्तमान दिनों में हिंदू त्योहारों को बीजेपी ने कुछ इस तरह इस्तेमाल किया है कि हिंसा में वृद्धि हो और उसका वोट बैंक सुरक्षित हो। इस राजनीतिक समर्थन की वजह से यह आक्रामक समूह ख़ुद को सशक्त महसूस करते हैं उनके अंदर प्रतिरक्षा की भावना मज़बूत होती है। हिंसा फैलाने का चक्र कुछ इस तरह चलता है कि हिंदू जानबूझकर मुस्लिम मोहल्लों में घुसेंगे, मस्जिदों के सामने रुकेंगे, घर्णात्मक नारे लगाएंगे, उत्तेजित करने वाले गाने गाए जाएंगे , घर्णात्मक भाषण दिए जाएंगे, उत्तेजित करने की इस प्रक्रिया में मुसलमानों की ओर से अप्रतीकात्मक व्यवहार सामने आता है। यहां से मीडिया का काम शुरू होता है मीडिया इलाक़े की शांति भंग करने हिंदू धर्म पर हमला करने का इल्ज़ाम मुसलमानों पर लाद देता है और इस तरह पार्टी का लक्ष्य पूरा हो जाता है। यह एक निरंतर रूप से चलने वाला चक्र है जो विशिष्ट राजनीतिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।यह पैटर्न समूचे भारत में लागू किया जाता है जिसमें कुछ जगह जैसे हरियाणा के नूह में, यूपी और एमपी के कई ज़िले, दिल्ली और बिल्कुल वर्तमान ही में राम प्राण प्रतिष्ठा समारोह के चलते मुंबई और महाराष्ट्र के कई इलाकों में दोहराई गई घटनाएं।

मुंबई, 23 जनवरी, 2024 को अयोध्या के राम मंदिर आयोजन को लेकर दो समूहों के बीच तनाव पैदा होने के बाद पुलिसकर्मी तैनात। (तस्वीर : पीटीआई)

नागरिकों के दिमाग़ में बिठाया जा रहा है कि जिन लोगों को गालियां दी जा रही हैं यह लोग इसी क़ाबिल हैं कि इन्हें मारा जाए, यह पूरा कर्म माहौल को गर्म रखता है और यही से सुनिश्चित किया जाता है कि वोट धर्म के नाम पर डाला जाए। आवश्यकता इस चीज़ की है कि गिरगिटिया रंग में रंगे इन प्रयासों को इनकी असली तस्वीर में देखा जाए। इनका मुख्य लक्ष्य देश में मुसलमानों की नकारात्मक तस्वीर बनाना है और मुसलमान बार-बार उनके बनाए गए इस जाल में फंस जाते हैं। ज़रूरी यह है कि इस बात को समझा जाए कि लोग जाने अंजाने में इन उत्तेजित करने वाली चालों का मोहरा बन जाते हैं। यह लोग अपने राजनीतिक लक्ष्य के लिए उत्तेजनात्मक जाल फेंकते हैं उसके परिणाम में आने वाली मुसलमानों की प्रतिक्रिया को‌ बिना अपना लक्ष्य उजागर किए केवल अपने वोट बैंक को मज़बूत करने में इस्तेमाल करते हैं।

इस खेल के पीछे छिपे लोग मुसलमानों की ओर से तीव्र प्रतिक्रिया की आशा करते हैं जिसके परिणाम वश न केवल इस्लाम बल्कि मुसलमानों को भी गंभीर हानि उठानी पड़ती है। क्रोध का आना प्राकृतिक है लेकिन बुद्धिमानी नहीं है। बल्कि हमें चाहिए कि ऐसी स्थिति में हम शांत रहने की कोशिश करें क्योंकि फौरी और भावनात्मक प्रतिक्रिया हमारे लिए उस हिंसक स्थिति से अधिक समस्या पैदा कर सकती है। मुसलमानों को चाहिए कि ऐसी स्थिति में मज़बूत रहें और ख़ुद को किसी जाल में ना फसने दें। जब भी ऐसी छेङ ख़ानी की हिंसक स्थिति में खुद को पाएं तो शांत रहें और भावनात्मक प्रतिक्रिया देने से बचें।

हरियाणा के नूंह में भड़की हिंसा के बाद प्रशासन द्वारा अवैध निर्माण के ख़िलाफ़ अभियान में तोड़ी गई दुकानों के मलबे के पास प्रतिक्रिया करता एक दुकानदार। (तस्वीर : दी टाईम्स ऑफ़ इंडिया)

अपने धर्म का अनुपालन और उस पर मज़बूती से जमे रहना ही एक वह चाबी है जो हमें इस दुनिया में तमाम कठिनाइयों से निकलने की अपार शक्ति प्रदान करती है। समय की मांग है कि हम वापस इस्लाम की शिक्षा की तरफ़ पलटें, इस अंधेरी स्थिति में कुरआन और सुन्नत ही एक केवल रोशनी है। मुसलमानों के लिए पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जीवनी मार्गदर्शन है। हमें चाहिए की प्रेरणा के लिए हम उनकी जीवनी की तरफ़ वापस पलटें। इसके लिए ताइफ की घटना एक उल्लेखनीय उदाहरण है। अत्यंत दुखी और ज़ख्मी होने के बावजूद पैगंबर मोहम्मद ने उल्लेखनीय व उदाहरणीय शांत स्वभाव का प्रदर्शन किया। जब फरिश्ता आपके पास आया तो आपने भावनात्मक प्रतिक्रिया न देते हुए समझदारी और मानवता के भाव से भरपूर जवाब दिया। इस हादसे के बाद पैगंबर मोहम्मद अल्लाह की तरफ़ पलटे अल्लाह से क्षमा प्राप्ति की प्रार्थना की और जिन लोगों ने आपको हानि पहुंचाई उनके लिए प्रार्थना की, आपने उन्हें माफ़ किया और अल्लाह से प्रार्थना की, कि उन्हें सही मार्गदर्शन पर ले आए पैगंबर के इस अमल में हमारे लिए उदाहरण व सीख है।

उत्तेजक रैली, नारे, भाषण, आक्रमण उन पत्थरों के समान है जो पैगंबर पर ताइफ में फेके गए थे, तो अब हमें चाहिए कि हमारी प्रतिक्रिया में पैगंबर की प्रतिक्रिया की झलक हो, हमें अपने देशवासियों के लिए उचित मार्गदर्शन पर आने की प्रार्थना करते रहना चाहिए, अल्लाह से क्षमा प्राप्ति करते रहें और इस्लाम का दृढ़ता के साथ पालन करते रहें।

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