‘चुप्पी तोड़ो’ : उत्तर प्रदेश और हरियाणा में हो रहे गैर-न्यायायिक हत्याओं पर सिटीजन्स रिपोर्ट का मोचन

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ये रिपोर्ट साल 2017-18 में हुए कुल 28 गैर-न्यायायिक हत्याओं (जिसमे 16 उत्तर प्रदेश और 12 हरियाणा के मेवात ज़िले के केस हैं), उनका दस्तावेजीकरण भी है | परिवारों के बयान और उपलब्ध कानूनी कार्यवाहियों और कागजातों के विश्लेषण से उभरे इस रिपोर्ट में इन ‘पुलिस मुठभेड़ों’ के सच को उजागर किया गया है और पाया है की कैसे ये मुठभेड़ असल में पुलिस द्वारा पूर्वनियोजित तरीके से हत्याओं का सिलसिला है |

50 से भी ज्यादा पुलिस एनकाउंटर का सूत्र उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जुर्म रोकने के तरीकों से उभरता है | मुख्यमंत्री महोदय के इस बयान में ये साफ़ झलकता भी है – ‘जिन लोगों को बन्दूक की नोक पर विश्वाश है, उन्हें बन्दूक की ही भाषा में ही जवाब देना चाहिए ’ |

ये रिपोर्ट हमें इन हत्याओं की परिस्थति और जांच के पहलुओं से अवगत कराते हैं और बताते हैं की कैसे जुर्म रोकने के नाम पर लोगों को ठगा जा रहा है | इन हत्याओं में तकरीबन हर या पीड़ित या तो मुसलमान, दलित या बहुजन समुदाय के हैं और वंचित सामजिक-आर्थिक समुदाय से आते हैं | बिना किसी शक के हर परिजन हमें बताते हैं की लोगों को या तो पुलिस द्वारा अगवा किया गया या उनके मुखबिरों द्वारा फंसाया गया | मरने वाले हर शख्स के शरीर से दिखते ज़ख्म पुलिस प्रताड़ना को साफ़ दर्शाते हैं | पोस्ट-मोर्टेम रिपोर्टों से भी ये साफ़ दिखता हैं कि पुलिस ने बहुत नज़दीक से मरने वालों के कमर के ऊपर गोलियां चलायी है |

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को दरकिनार करते हुए हर केस में ही दोषी पुलिस अफसरों के ऊपर कोई कार्यवाही किये बिना मरने वाले लोगों पर पुलिस ने एफ.आई.आर. दर्ज कर दी | हर केस में दर्ज हुए इन दस्तावेजों में तकरीबन एक जैसी कहानियां ही बनायीं गयी हैं जिससे इनके सच्चे होने पर संदेह होता है | हर केस में ही ‘गुंडा’ मारा जाता है जबकि दुसरे लोग भाग निकलते हैं | पुलिस के उनके घेर लेने पर, और संख्या में कई ज्यादा होने पर भी हर बार ही ऐसा होता है – जोकि अद्भुत सा ही है | पुलिस ने एक भी केस में मरने वालों के परिजनों का कोई बयान दर्ज नहीं किया है | दूसरी तरफ परिवार के लोगों और सामजिक कार्यकर्ताओं को लगातार परेशान किया जा रहा है | वक्त-बेवक्त उनके घरों पर ‘छापेमारी’ और तोड़फोड़ की जा रही है | इनके ऊपर फर्जी मुकदमें भी दर्ज किये जा रहे हैं ताकि सुनियोजित तौर पर पुलिस की बनायीं कहानियों पर कोई सवाल नहीं किया जाये और न्याय की प्रक्रिया पूरी ना हो पाए |

हरियाणा के मेवात क्षेत्र में 2010 से 2017 तक के केसों में भी यही बातें देखने को मिलती हैं | जहाँ पुलिस ने आजकल में इन हत्याओं को गो-हत्या को रोकने के लिए जायज़ ठहराने की कोशिश की है, पुराने केस का अध्यययन पुलिस के झूठों के पुलिंदे को ध्वस्त करते हैं | हमने पाया की पुलिस ने ना परिवार के लोगों को अपने परिजनों की लाश को ले जाने दिया, बल्कि कई बार उन्हें पुलिस की मौजूदगी में दफनाना पड़ा | परिवारों को ना ही एफ. आई. आर. दी गयी ना ही पोस्ट-मोर्टेम रिपोर्टों को उनके सुपुर्द किया | साफ़ धमकी दी गयी ताकि वो अपनी तरफ से कोई कार्यवाही ना करें |

इस रिपोर्ट से उभरे मुद्दों ने कानून के दंड प्रक्रिया संहिता में ज़रूरी बदलाव पर भी गौर किया है | CrPC के अनुच्छेद 46 (2), भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 300 (अपवाद 3), दंड प्रक्रिया संहिता के अनुच्छेद 197 के साथ सुप्रीम कोर्ट के केस PUCL V/s State of Maharashtra से उभरे दिशानिर्देश में भी परिवर्तन की अपेक्षा है जिसमे मृतकों के परिवारों के बयान दर्ज करना (ना कि सिर्फ गवाहों का), परिवार के लोगों को तुरंत एफ.आई.आर. और पोस्ट-मोर्टेम रिपोर्ट दिए जाने के प्रावधान को उभारने की ज़रुरत है | ये भी अपेक्षित है की एफ.आई.आर. को भारतीय दंड संहिता के अनुच्छेद 302 में दर्ज कराया जाये – जिससे पुलिस को आखिरी हक़ ना हो कि किस तरह की एफ.आई.आर. दर्ज करनी है | साथ ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को मज़बूत किया जाए जिससे पीड़ित लोगों और उनके परिवारों को न्याय की लडाई में मदद की जा सके |    

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