तेलंगाना में 7 दिनों में 18 छात्रों की आत्महत्या

राज्य में परीक्षा कराने का ठेका एक प्राइवेट कंपनी को दिया गया था। हर राज्य में अब यह धीरे-धीरे होने लगा है। परीक्षा बोर्ड की अपनी जवाबदेही होती है। सरकारें अब इन्हें मज़बूत करने की जगह पिछले दरवाज़े से निजी कंपनियों को परीक्षा कराने का ठेका दे रही हैं। हो सकता है कि उनके पास बेहतर तरीका हो, लेकिन सरकार यह बुनियादी काम ख़ुद क्यों नहीं कर सकती है?

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7 दिनों में 18 छात्रों की आत्महत्या, आज न कल आपको शिक्षा के सवाल पर आना ही होगा.

जी नागेंद्र बिहार या यूपी का नहीं है। तेलंगाना का छात्र है। बोर्ड के इम्तहान में गणित में ही फेल हो गया। जो उसका प्यारा विषय था। सदमा बर्दाश्त नहीं हुआ तो जी नागेंद्र ने आत्महत्या कर ली। एक और छात्र ने दो विषयों में फेल होने के कारण ज़हर खा लिया। रिज़ल्ट आने के एक हफ्ते के भीतर 18 छात्रों ने आत्महत्या कर ली है। 11 वीं और 12 वीं के इम्तहान में 9.74 लाख छात्रों ने परीक्षा दी थी। 3 लाख 28 हज़ार फेल हो गए। तेलंगाना में अभिभाव संघ आंदोलन कर रहा है। कोर्ट के आदेश के कारण तीन लाख कापी की दोबारा जांच होगी।

राज्य में परीक्षा कराने का ठेका एक प्राइवेट कंपनी को दिया गया था। हर राज्य में अब यह धीरे-धीरे होने लगा है। परीक्षा बोर्ड की अपनी जवाबदेही होती है। सरकारें अब इन्हें मज़बूत करने की जगह पिछले दरवाज़े से निजी कंपनियों को परीक्षा कराने का ठेका दे रही हैं। हो सकता है कि उनके पास बेहतर तरीका हो, लेकिन सरकार यह बुनियादी काम ख़ुद क्यों नहीं कर सकती है। तेलंगाना में ग्लोबरेना टेक्नॉलजी नाम की कंपनी को ठेका दिया गया है। इस पर गड़बड़ी के आरोप लग रहे हैं। जी नव्या को तेलुगू की कापी में ज़ीरो मिला था। दोबारा जांच हुई तो 99 मिला। इंडियन एक्सप्रेस की श्रीनिवास जान्यला की ख़बर से यह सब पता चला है।

पिछले साल मुंबई यूनिवर्सिटी का रिज़ल्ट भी कई महीनों तक इसी तरह बर्बाद रहा। बड़ी संख्या में छात्रों के रिज़ल्ट में हेराफेरी हो गई। छात्रों को अपने रिज़ल्ट के लिए आंदोलन करना पड़ा। आप ज़रा इंटरनेट पर सर्च करें। मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट में भी प्रश्न पत्र लीक होने का मामला था। जब दिल्ली पुलिस ने जांच की तो प्राइवेट कंपनी में माना कि उनका सिस्टम फूल-प्रूफ नहीं है। छात्रों का जीवन बर्बाद हुआ और निजी कंपनी को मुनाफ़ा। धीरे-धीरे सरकारी परीक्षाएं महंगी होती जा रही हैं। फार्म भरने की फीस दो हज़ार से लेकर तीन हज़ार तक की होने लगी है।

भारत की जनता पर एक ज़िद सवार है। वह राजनीति में नेता का शौक तो पूरा कर देती है मगर अपना सवाल भूल जाती है। ख़राब शिक्षा व्यवस्था का आर्थिक नुकसान कितना होता है, इसी का हिसाब सभी को करना चाहिए। बेशक अभिभावकों का दल हिन्दू-मुस्लिम के जाल में फंस चुका है लेकिन उस जाल में फंसे अभिभावकों को भी इस सवाल से लड़ना होगा। कुछ लोग लड़ भी रहे हैं। फिर भी चुनावों को इन मुद्दों से अलग करने वाले लोग ग़लती कर रहे हैं। कोई नहीं। चुनाव के बाद ही कम से कम इस पर लौट आएं तो बहुत है। यह ज़रूरी काम है।

ज़िलों और कस्बों में पढ़ने वाले छात्रों और खासकर छात्राओं के साथ बड़ा अन्याय हो रहा है। उन्हें बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का फर्ज़ी स्लोगन थमा दिया गया है। पढ़ने के लिए स्कूल और कालेजों का स्तर घटिया बना दिया गया है। नतीजा होगा कि लड़की या लड़का बीए तो पास होंगे मगर किसी लायक नहीं होंगे। पढ़ने के लिए पलायन करना पड़ रहा है और कोचिंग पर लाखों लुटाना पड़ रहा है।

अभी नहीं तो चुनाव के बाद के लिए इस मुद्दे को लेकर तैयारी कर लें। भाजपा हो या कांग्रेस या कोई भी क्षेत्रिय दल, उन पर दबाव डालें। ख़ुद भी जानकारी हासिल करें, उस पर बहस करें। सोचिए, नया राज्य बना है तेलंगाना। उसे तो उम्मीदों से लबालब होना चाहिए।
सरकारें जनता के लिए नहीं बनती है, प्राइवेट कंपनियों को ठेका देने के लिए बनती है ताकि उनके पैसे लेकर फिर सत्ता में वापस आया जा सके। हम जाने अनजाने में एक ऐसा तंत्र बनने दे रहे हैं जिसके शिकार हमीं होंगे। शिक्षा का सवाल राजनीतिक सवाल है। यह चुनाव तो गोबर हो गया लेकिन उसके बाद के लिए ही इन विषयों पर तैयारी कीजिए और नई सरकार पर कुछ ठोस करने के लिए दबाव बनाइये।

लेख साभार: रवीश कुमार

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