उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा चरमपंथी हत्याओं से चिंतित संयुक्त राष्ट्र

11 जनवरी 2019 को, संयुक्त राष्ट्र के चार मानवाधिकार विशेषज्ञों ने मार्च 2017 से उत्तर प्रदेश में पुलिस द्वारा कम से कम 59 असाधारण हत्याओं के आरोपों के बारे में चिंता व्यक्त की है। विशेषज्ञों ने 15 मामलों में भारत सरकार को विस्तृत जानकारी भेजी है, और अभी तक भारत सरकार की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है.

0
387
UP Chief Minister Yogi Adityanath
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 9 मई 2018 को उत्तर प्रदेश पुलिस के अधिकारियों द्वारा कथित रूप से चरमपंथी हत्याओं के 17 मामलों की जाँच का आदेश दिया था.
  • 14 जनवरी, 2019 को सुप्रीम कोर्ट एक पेटीशन पर विचार करने करेगा, जिसे पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) और सिटिजन अगेंस्ट हेट (CAH) द्वारा उठाया गया था.

11 जनवरी 2019 को, संयुक्त राष्ट्र के चार मानवाधिकार विशेषज्ञों ने मार्च 2017 से उत्तर प्रदेश में पुलिस द्वारा कम से कम 59 असाधारण हत्याओं के आरोपों के बारे में चिंता व्यक्त की है। विशेषज्ञों ने 15 मामलों में भारत सरकार को विस्तृत जानकारी भेजी है, और अभी तक भारत सरकार की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है.

विशेषज्ञों ने 15 गैर न्यायिक हत्याओं के मामलों में भारत सरकार को विस्तृत जानकारी भेजी है, जिनमें से अधिकांश गरीबी में रहने वाले मुस्लिम समुदायों के व्यक्ति हैं। उन्हें अभी तक उनके पत्र का जवाब नहीं मिला है।

जो कुछ जानकारी और सबूत मिले वें इंगित करते है कि पुलिस हिरासत में हत्याएं हुई. हालाँकि सभी मामलों में, पुलिस ने कहा कि हत्या मुठभेड़ों के दौरान और आत्मरक्षा में हुई थी।

संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने कहा, “हम घटनाओं के पैटर्न के बारे में बहुत चिंतित हैं; व्यक्तियों को कथित तौर पर अपहरण या उनकी हत्या से पहले गिरफ्तार किया गया था, और उनके शरीर पर चोटों के निशान थे।”

उन्होंने यह भी चिंता व्यक्त की कि जांच पर उच्चतम न्यायालय के दिशा निर्देशों का पालन नहीं किया गया। इसमें पुलिस को हत्याओं के पश्चात् अभियुक्त के परिवार के सदस्यों को सूचित करने, घटना स्थल की जाँच का संचालन करने, परिवारों को पोस्टमार्टम रिपोर्ट की प्रतियां प्रदान करने और एक स्वतंत्र जांच एजेंसी में मामलों को स्थानांतरित करने में सत्यनिष्ठा का सबूत नहीं दिया गया.

“हमारी जानकारी के अनुसार पुलिस पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे हैं, जिसमें पुलिस को हत्या से पहले पीड़ित को रिहा करने के लिए पैसे की मांग की गई थी” विशेषज्ञों ने कहा।

उन्होंने रिपोर्टों के बारे में गंभीर चिंता व्यक्त की कि पीड़ितों के परिवार के सदस्य और मामलों पर काम करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को परेशान भी किया गया है, पुलिस की तरफ से उन्हें धमकियों का सामना करना पड़ा और उनके खिलाफ झूठे आपराधिक मामले सामने आए और उन्हें डराने-धमकाने का भी प्रयास किया गया।

विशेषज्ञों ने कहा, “दुर्भाग्य से हम हत्याओं के अन्य मामलों के साथ-साथ खतरों और उत्पीड़न की रिपोर्ट भी प्राप्त कर रहे हैं, ये बेहद गंभीर आरोप हैं, जिन पर तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है।”

उन्होंने उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा बल के उपयोग की तत्काल समीक्षा करने का आह्वान किया, यह सुनिश्चित करने के लिए कि सभी कानून प्रवर्तन कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुपालन में की गई या नहीं. और शीघ्र ही स्वतंत्र रूप से संभावित गैरकानूनी हत्याओं के सभी आरोपों की पूरी जांच और अपराधियों के खिलाफ मुकदमा चलाने को कहा।

“पीड़ितों के परिवार के सदस्यों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी फटकार से बचाया जाना चाहिए, और उनके खिलाफ धमकी और उत्पीड़न की जांच की जानी चाहिए” विशेषज्ञों ने कहा।

उन्होंने उच्च श्रेणी वाले राज्य सरकार और पुलिस के अधिकारियों द्वारा जारी बयानों पर अपनी चिंता को भी उजागर किया, जो हत्या को सही ठहराने या मंजूरी देने के लिए उकसा रहे थे। भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 9 मई 2018 को 18 लोगों की मौत की जांच शुरू की, जिसमें विशेषज्ञों द्वारा उठाए गए सवाल भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट सोमवार को एक स्वतंत्र निकाय द्वारा हत्याओं की जाँच अदालत की निगरानी में किए जाने की एक पेटीशन पर सुनवाई करने वाला है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here