छपाक से छपाक तक!

मुझे लगता है आज भी ज्यादातर लोग फिल्मों को सिर्फ अपने मनोरंजन साधना के तौर पर लेते हैं। लोगों के अंदर घटनाओं की गंभीरता के प्रति चेतना का विकास ही नहीं हो पाता है। ऐसा लगता है कि हमारे अंदर पैसे देकर मनोरंजन खरीदने की प्रवृत्ति का विकास हो गया है। मार्केट की दुनिया ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा है। हमारे अंदर की मनुष्यता को भी तौल मोल में बदल दिया है। कमोबेश मुद्दे विशेष पर आने वाली किताबों का भी यही हाल है। वे अपना अमिट छाप उन किताबों को लेखकों पर भी नहीं छोड़ पाते। ढ़ेरों ऐसी कहानियां समाज में तैर रही हैं। जिसमें इन लिखने पढ़ने वाले नाम क्राइम की दुनिया में अग्रणी भूमिका में है। लिखने वाले लोग ही खुद को क्यों नहीं बदल पाते हैं। इसका समाजिक विश्लेषण होना चाहिये।

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मैं कल फेसबुक पर एक लड़की की जिंदगी से जुड़ी नोट पढ़ रहा था। मैं उस नोट को पढ़ कर भयभीत हो गया। उसने देश के जाने माने साहित्यकार पर बचपन में ही रैप क्राइम का आरोप लगाती है। आज वो साहित्यकार इस दुनिया में नहीं है इसलिए नाम लेना मुनासिब नहीं समझा। आज पीड़िता अपने जीवन के आधी पड़ाव को पार कर चुकी है। उसके लिखने के स्टाईल से पता चलता है कि आज भी बचपन में मिले वो घाव बिल्कुल उसी तरह ताज़ा है। जैसे आज ही उसके साथ घटना हुई हो। मैं भी उस लेखक की कविताओं का फेन रहा हूँ। बल्कि हर व्यक्ति जो हिन्दी साहित्य में दिलचस्पी रखते हैं वे उनकी कविताओं के शौकीन होंगे। मैं भी बड़े शौक से उनकी कविताओं को पढ़ता हूँ। मुझे उनपर लगे इल्जाम का पहली बार पढ़ने पर यक़ीन नहीं हुआ। लेकिन उस पोस्ट पर आए कमेंट्स ने मुझे 100 ℅ यक़ीन ने बदल दिया।

पिछले कुछ सालों में mitoo कैंपेन के जरिये दुनिया के बड़े बड़े लोगों पर रैप क्राइम के जघन्य अपराधों का आरोप लगाया जा चुका है। ये वो लोग हैं जो अपने कांधो पर समाज की तब्दीली का बोझ उठाते हैं।
ये लोग प्रगतिशील लेखक हैं और खुद को प्रगतिशील आंदोलन के अगुवा मानते हैं। जहां औरतों की आज़ादी पर बात करना अपनी पहली प्राथमिकता समझते है। इन सब के बावजूद आज़ादी की तमन्ना लिये ये औरतें इन प्रगतिशील आंदोलन के क़रीब आती हैं। लेकिन यहां पर ये यौनिक ग़ुलामी की जंजीरों में जकड़ ली जाती हैं। यहां पर आकर इन औरतों की आवाज दब जाती है। क्योंकि अब इनके लिए आवाज़ उठाने वाले खुद अपना शिकार बना बैठते हैं। जहां ये मात खा जाती हैं। यहां पर इनके खिलाफ एक्का दुक्का लोग ही खड़े नजर आते हैं। खुद को बचाने के लिए चुप रहना ही मुनासिब समझती हैं।

आज दीपिका पादुकोण अभिनीत फिल्म “छपाक” रिलीज़ हो गई है। यह फ़िल्म एसिड अटैक महिलाओं की जिंदगी पर आधारित है। एसिड पीड़िता लक्ष्मी अग्रवाल की जिंदगी पर आधारित इस फ़िल्म ने हर खास व आम लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया है। एसिड पीड़िता से सहानुभूति रखने वाले हर कोई इस फ़िल्म का बेसब्री से इन्तेजार कर रहा है। आज वो इन्तेजार खत्म होने वाला है। देश के ज्वलंत मुद्दों पर आधारित फिल्मों का इन्तेजार होना भी चाहिए। आखिर बॉलीवुड वर्तमान के ज्वलंत मुद्दों पर फ़ौरन एक्टिव होकर फिल्म क्यों नहीं बनाती है। ताकि वक्त रहते हुए उन घटनाओं की गंभीरता को समझने में आसानी हो।
समाज में हो रहे नाइंसाफी जुल्म और बर्बरियत के खिलाफ सरकारी पहल तो शुरू से ही नाकाफ़ी है। देश में हर सरकारें कानून बनाना ही पहली और आखिरी प्राथमिकता समझते हैं। इन सरकारों को सामाजिक परिवर्तन की बुनियाद को मजबूत बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं होती है। ऐसे में समय समय पर बॉलीवुड के द्वारा आम लोगों की जागरूकता के लिए फ़िल्म बनाना एक बड़ा साहसिक क़दम है। क्योंकि इससे आम व खास हर लोगों में विषय की समझ और परख बढ़ जाती है। ऐसे भी समाज में कल्चरल टूल्स के जरिये सामाजिक मुद्दों को समझने का इतिहास पुराना है। बहरहाल ये पहला मौका नहीं है जब किसी समाजिक मुद्दे की हकीकत को फिल्माने की कोशिश की गई हो। इससे पहले भी ढ़ेरों फ़िल्मे मुद्दे विशेष बनाये गये हैं। क्या उसका फायदा अनपढ़ लोगों को छोड़ भी दें तो शिक्षित वर्ग में दिखाई देता है? इसका कारण क्या हो सकता है?
मुझे लगता है आज भी ज्यादातर लोग फिल्मों को सिर्फ अपने मनोरंजन साधना के तौर पर लेते हैं। लोगों के अंदर घटनाओं की गंभीरता के प्रति चेतना का विकास ही नहीं हो पाता है। ऐसा लगता है कि हमारे अंदर पैसे देकर मनोरंजन खरीदने की प्रवृत्ति का विकास हो गया है। मार्केट की दुनिया ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा है। हमारे अंदर की मनुष्यता को भी तौल मोल में बदल दिया है। कमोबेश मुद्दे विशेष पर आने वाली किताबों का भी यही हाल है। वे अपना अमिट छाप उन किताबों को लेखकों पर भी नहीं छोड़ पाते। ढ़ेरों ऐसी कहानियां समाज में तैर रही हैं। जिसमें इन लिखने पढ़ने वाले नाम क्राइम की दुनिया में अग्रणी भूमिका में है। लिखने वाले लोग ही खुद को क्यों नहीं बदल पाते हैं। इसका समाजिक विश्लेषण होना चाहिये।

कानून बनाकर ये जनता को दिग्भ्रमित करते हैं कि हमने अपने कार्यकाल में सबसे अनोखा काम किया। सबको पता है कि किसी समाजिक परिवर्तन की बुनियाद वहां के शैक्षणिक ढांचा को मजबूत किये बिना नामुमकिन है। फिर भी इस दिशा में सरकार के साथ साथ आवाम का योगदान भी शून्य रहा है। एक ऐसा देश जहां करोड़ों की आबादी के पास रोटी कपड़ा और मकान की मूलभूत आवश्यकताएं मुंह बाए खड़ी हैं। वहां प्राइवेट एडुकेशन का फलने फूलने का क्या तात्पर्य है।
देश में बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ के नारों से चुनाव जीतने वाली पार्टी बीजेपी आज सत्ता में है। उसके बाद भी एसिड अटैक की समस्याओं ने लगातार वृद्धि हुई है। आंकड़े बताते हैं 2012 में एसिड अटैक के 85 मामले प्रकाश में आए जबकि 2015 में ये संख्या बढ़कर 140 हो गई। NCRB के मुताबिक 2016 में 283 मामले सामने आए। ये वो मामले हैं जिनकी रिपोर्ट दर्ज की गई जबकि बहुत से मामलों की शिकायतें तो दर्ज भी नहीं कराई जातीं। इन हमलों में मुख्यतः 14 से 35 साल की महिलाओं को ही शिकार बनाया गया।

शाहिद सुमन

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