अगर अनुच्छेद 370 भी नोटबंदी सिद्ध हो तो क्या होगा?

इस वर्ष, स्वतंत्रता दिवस पर, तो प्रधान सेवक ने 370 की उपलब्धि पर अपनी पीठ खूब थपथपाई, लेकिन दूर नहीं कि 2024 के चुनाव अभियान में उन्हें इसको एक दुःस्वप्न की तरह भूलने के लिए मजबूर होना पड़े!

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कश्मीर के संबंध में, भाजपा ने दो बड़े झूठ फैलाए हैं। पहला यह कि सरदार वल्लभ पटेल अनुच्छेद 370 के खिलाफ थे और पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसे जबरन संविधान में शामिल किया। तथ्य यह है कि पंडित नेहरू संयुक्त राज्य में थे जब वह 2 नवंबर 1949 को यह संविधान में शामिल किया गया। उनका पहले का समर्थन प्राप्त किया गया था, लेकिन सरदार पटेल ने खुद असेंबली को मनाने का काम लिया। उस समय, श्यामा प्रसाद मुखर्जी विधानसभा में मौजूद थे, लेकिन उन्होंने विरोध करने के बजाय चुप रहना पसंद किया। बाद में, जनसंघ की अध्यक्षता संभालने के बाद, वह राजनीतिक लाभ के लिए उनके खिलाफ हो गए।

जम्मू-कश्मीर के बारे में दूसरी गलत धारणा यह फैलाई जाती है कि कांग्रेस ने मुसलमानों की मुंह भ्राई के लिए गैर-राज्य निवासियों को अनुच्छेद 35 (ए) के माध्यम से घाटी में संपत्ति खरीदने और रोजगार प्राप्त करने पर प्रतिबंध लगा दिया । सच्चाई इसके विपरीत है। यह कानून वास्तव में 1927 में डोगरा महाराजा हरि सिंह द्वारा बनाया गया था। कई कारकों के कारण, उन्हें यह कानून बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा था। संयोग से, मुसलमानों की इसमें कोई भागीदारी नहीं थी। कश्मीरी पंडित चिंतित थे कि सरकारी नौकरियों में पंजाबी और अन्य गैर-राज्य निवासियों का अनुपात बढ़ रहा था। इसके कारण पंडितों का प्रतिनिधित्व सिकुड़ता जा रहा है। चूंकि पंजाबियों को प्रतियोगी परीक्षाओं में हरा पाना मुश्किल था, इसलिए उन्होंने आरक्षण की मांग की और इसे कानून बना दिया। उस समय कश्मीर के निरक्षर मुसलमानों को सरकारी रोजगार में कोई दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए आरक्षण उनके लिए बेकार था।

आगे चलकर इंदिरा गांधी के कहने पर गवर्नर जगमोहन ने कश्मीरी पंडितों को घाटी से निष्कासित करवा दिया और वे उस सुविधा से वंचित हो गए। यह और बात है कि उन्होंने शरणार्थियों के रूप में अनगिनत सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाया है। इस तथ्य को सिरे से भुला दिया जाता है कि घाटी के मुसलमानों की तरह, जम्मू के डोगरों को भी 35 (ए) के तहत सभी विशेषाधिकार प्राप्त थे, लेकिन उन्हें वे अयोग्य निकले कि किसी भी क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा न कर सके । मुसलमानों ने अल्लाह के फज्ल से रोजगार और वाणिज्य दोनों क्षेत्रों में कश्मीरी पंडितों और जम्मू डोगरों को पछाड़ दिया। यही कारण है कि जम्मू और कश्मीर ने गुजरात सहित कई राज्यों को विभिन्न क्षेत्रों में पीछे छोड़ दिया है। यह एक अच्छा संयोग है कि 90 साल पहले, जिन कश्मीरी पंडितों ने, ‘‘कश्मीर कश्मीरियों का है,’’ का नारा लगाकर पंजाबियों पर न केवल नौकरियों बल्कि अचल संपत्ति खरीदने पर भी प्रतिबंध लगवा दिया था, वे ही अब 35 (ए) के विरोध पर उतारू हंै।

हालांकि, हाल ही में जाने-माने कश्मीरी पंडित, जैसे सेवानिवृत्त एयर वाइस मार्शल कपिल कोक, प्रसिद्ध हृदय विशेषज्ञ उपेंदर कोल, वरिष्ठ पत्रकार शारदा उगरा, प्रदीप मगाजीन, अनुराधा भासन और ई.के. रैना जैसे 64 जाने माने बुद्धिजीवी कश्मीरी पंडितों ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया है और कहा है कि यह भारत सरकार का कश्मीर के लोगों के साथ एक ऐतिहासिक विश्वासघात है। उन्होंने इस प्रक्रिया को एक चोरी छिपे की जाने वाली जबरदस्ती कहा है। उन्होंने कहा है कि यह फैसला उनकी सलाह के बिना एकतरफा रूप से उन पर थोप दिया गया है। इसपर जाने माने सिखों और डोगरा समाज के लोगों के हस्ताक्षर, इस दावे का खंडन करते हैं कि कश्मीरी जनता सहित पूरा देश इस फैसले से खुश है। राजा हरि सिंह के समय में, 35 (ए) के तहत, अन्य राज्यों के पुरुष कश्मीरी महिलाओं (मुस्लिम और पंडित दोनों सहित) से विवाह करते थे और वहां संपत्ति के हकदार बन जाते थे। बाहरी लोगों को अपनी पत्नी के नाम पर संपत्ति हासिल करने से रोकने के लिए, उन्होंने इस्लामी शरीयत के खिलाफ कानून बनाया ताकि लड़कियों को इस तरह की शादी के बाद विरासत देने से रोका जा सके। भाजपा के मूर्खों का मानना है कि चूंकि बाहरी लोग वहां संपत्ति नहीं खरीद सकते, इसलिए कश्मीरी लड़कियों ने उनसे शादी नहीं की। शादी के बाद दुल्हन आमतौर पर अपनी ससुराल आ जाती है। दूर दराज शादी करने वाली लड़की का वैसे भी अपनी मायके से नाता टूट जाता है। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर जैसे लोग वर्तमान में बड़ी ही निर्लज्जता के साथ जनसभाओं में कश्मीर से बहू लाने की बात कर रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि हरियाणा में बेटियों को मां के गर्भ में ही मार डालना आम बात है। वर्तमान में इस क्रूर प्रांत में 1000 पुरुषों की तुलना में केवल 842 लड़कियां हैं। इसलिए, उनके लिए बाहर जाकर शादी करना अनिवार्य है, लेकिन अगर वे कश्मीरी बहू लाना चाहते हैं, तो पंडित की लड़कियां पहले से ही बड़ी संख्या में जम्मू, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के अंदर मौजूद हैं।

कश्मीर की मुस्लिम लड़कियां तो ऐसे लोगों के मुंह पर थूकें गी भी नहीं, जो अपनी बच्चियों के हत्यारों हैं और दूसरों की बेटियों का सामूहिक बलात्कार करते फिरते हैं। उन्हीं लागों ने दिल्ली को रेप कैपिटल बना रखा है। इस मामले में हरियाणा भी दिल्ली से पीछे नहीं है। खट्टर जैसे लोगों की छाया में राम गोपाल यादव और आसाराम बापू के आश्रम में क्या होता है, इससे पूरी दुनिया वाकिफ है।
इस तरह की बेतुकी और गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी कश्मीर की लड़कियों के अपमान के साथ, जम्मू की महिलाओं के लिए भी अपमानजनक है। उन्हें लगता है कि विभिन्न प्रतिबंधों को समाप्त करने पर भी कोई भी उनकी ओर आकर्षित नहीं होता है।रा

राजा हरि सिंह डोगरा समुदाय से ताल्लुक रखते थे और अपनी ताकत के बावजूद वे चिंतित थे कि मौसम की अनुकूलता के कारण ब्रिटिश अधिकारी कहीं कश्मीर में स्थायी रूप से न रहने लग जाएं। वही खतरा अभी भी जम्मू के डोगरा निवासियों के लिए है। यही कारण है कि उन्होंने अपनी सुरक्षा की मांग शुरू कर दी है। डोगरा समाज के अपेक्षित बेचैनी को दबाने के लिए पैंथर पार्टी के नेता हर्ष देव सिंह, डोगरा स्वाभिमान संगठन के संस्थापक चौधरी लाल सिंह, कांग्रेस के रमन भल्ला और सभी पूर्व मंत्रियों से चार दिनों के लिए उनकी बोलने की स्वतंत्रता छीन ली गयी। यही कारण है कि फारूक अब्दुल्ला और गुलाम नबी आजाद का बयान आया लेकिन जम्मू के सभी धुरन्धर अपने मुँह में दही जमाए रहे। पांचवें दिन, भाजपा नेता और जम्मू के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष निर्मल सिंह की चोंच खुली, तो उन्होंने जमीन की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने और नौकरी में आरक्षण की मांग कर दी। निर्मल सिंह ने स्वीकार किया कि चूंकि विपक्ष ने भूमि और रोजगार पर बहस शुरू कर दी है इसलिए हम इस बारे में भी बात करना शुरू कर रहे हैं कि 370 खत्म होने के बाद क्या होता है।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र रैना का मानना है कि जम्मू और कश्मीर की विधानसभा स्थानीय लोगों की सुरक्षा के लिए कानून बनाएगी। उनके समर्थन में, भाजपा महासचिव नरेंद्र सिंह कहते हैं कि केंद्र सरकार शासित प्रदेश पांडिचेरी में भी तो बाहरी लोग कृषि भूमि नहीं खरीद सकते हैं। भाजपा के प्रांतीय प्रवक्ता सुनील सेठी ने स्वीकार किया कि सरकार इन मुद्दों पर काम कर रही है। हमारे पड़ोसी राज्यों में, स्थानीय लोगों को कृषि क्षेत्र में सुरक्षा प्रदान करने के लिए कानून मौजूद हैं। उन्होंने उदाहरण दिया कि पंजाब में किसी व्यक्ति को सरकारी रोजगार प्राप्त करने के लिए कम से कम 6 साल का निवास होना अनिवार्य है। हिमाचल प्रदेश में, कोई भी बाहरी व्यक्ति कृषि भूमि नहीं खरीद सकता है। कुछ क्षेत्रों में, कोई भी गैर-राज्य निवासी किसान की भूमि का 50 प्रतिशत से अधिक नहीं खरीद सकता है। उसके अनुसार, प्रत्येक भारतीय जम्मू और कश्मीर में रह सकता है लेकिन इसके साथ स्थानीय लोगों की सुरक्षा भी अनिवार्य है और संरक्षण भी आवश्यक है।
प्रधान मंत्री ने बड़े उत्साह के साथ राष्ट्र को अपने संबोधन में, पश्चिम पाकिस्तान से आए शरणार्थियों और बाल्मीकि समुदाय का बखान किया, लेकिन सुनील सेठी अधिवास के मामले में उन्हें सुविधा देने के लिए तैयार नहीं हैं। भाजपा के पूर्व सांसद डॉ. गगन भगत पिछले एक साल से कह रहे हैं कि 35 (ए) के चले जाने का सबसे ज्यादा नुकसान जम्मू के डोगरा समाज का होगा , क्योंकि वे कश्मीरी मुसलमानों की शिक्षा और कला में पीछे हैं। उन्होंने अपने वीडियो में यहां तक कहा था कि अगर इसे हटा दिया गया, तो न केवल डोगरों को महाराष्ट्र के मराठों की तरह आरक्षण मांगने के लिए मजबूर किया जाएगा, बल्कि हो सकता है कि वे उग्रवाद की ओर बढ़ जाएं । डॉ. गगन पर पार्टी ने सख्ती की तो वे 7 महीने पहले इस्तीफा देकर नेशनल कॉन्फ्रेंस में चले गये ।
अब सवाल यह है कि अगले चुनाव में जम्मू का डोगरा समाज किस को वोट देगा? उस भाजपा को जिसने उनसे 35 (ए) के विशेषाधिकारों को छीन लिया और बाहरी लोगों को उन पर थोप दिया, या उन पार्टियों को, जो धारा 35 ए का विरोध करती हैं ताकि उनकी सुविधाओं का सिलसिला जारी रहे। भारत के इतिहास में पहली बार, एक प्रांत को केंद्रशासित प्रदेश में बदल दिया गया है और यह कश्मीर के साथ-साथ जम्मू के लिए भी एक अन्याय है। प्रधानमंत्री आश्वासन दे रहे हैं कि जम्मू और कश्मीर में जल्द ही चुनाव होंगे। जम्मू में, 30 प्रतिशत मुस्लिम हैं जो किसी हाल में भाजपा को वोट नहीं देंगे। अगर डोगरा समाज के 20 प्रतिशत नाराज लोग भी उनके साथ हैं, तो क्या भाजपा पहले की तरह 25 सीटें जीत पाएगी? अगर जम्मू-कश्मीर में भाजपा की स्थिति पहले से खराब होती है, तो क्या वह देश भर में अपना चेहरा दिखा पाएगी? इस असंतुलित निर्णय से कश्मीर के भीतर उग्रवाद पैदा हो सकता है, जिसकी आशंका कई लोग, जैसे खुफिया एजेंसी के पूर्व प्रमुख, जता चुके हैं। अगर ऐसा हुआ तो भाजपा का क्या होगा? कल्पना कीजिए कि नोटबंदी के बाद भाजपा ने यह मुद्दा उठाया था कि इससे काला धन खत्म हो जाएगा, खजाना भर जाएगा, आतंकवाद जड़ से खत्म हो जाएगा, और भी बहुत कुछ हो जाएगा और इसी नाम से उत्तर प्रदेश में चुनाव जीता गया, लेकिन 2019 के राष्ट्रीय चुनाव में, उन्हें नोटबंदी को पूरी तरह से भूल जाना पड़ा। इस वर्ष, स्वतंत्रता दिवस पर, तो प्रधान सेवक ने 370 की उपलब्धि पर अपनी पीठ खूब थपथपाई, लेकिन दूर नहीं कि 2024 के चुनाव अभियान में उन्हें इसको एक दुःस्वप्न की तरह भूलने के लिए मजबूर होना पड़े। आगे क्या होगा यह कोई नहीं जानता, लेकिन कुछ भी हो सकता है यह सभी जानते हैं ।

 

– डॉ. सलीम खान

(लेखक, भारतीय राजनीति के विशेषज्ञ और उर्दू की पत्रिकाओं में कॉलम लेखक हैं)

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