15 दिसंबर का दिन अलीगढ़ की सामूहिक स्मृति में दर्ज है

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15 दिसम्बर 2019, ये वो दिन है जो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया मिल्लिया इस्लामिया की सामूहिक स्मृति में अपनी अलग ही छाप छोड़ गया है।

नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन ने 15 दिसम्बर 2019 के दिन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया मिल्लिया इस्लामिया में हिंसक रूप धारण कर लिया, दोनों विश्वविद्यालयों के परिसरों में अर्द्धसैनिक बलों और पुलिस ने घुसकर ख़ूब उत्पात मचाया जिसमें बड़ी संख्या में छात्र एवं छात्राएं घायल हुए।

अलीगढ़ की बात करें तो 15 दिसंबर को वहां हुई कारवाई कई मायनों में न सिर्फ़ ये कि ग़ैर क़ानूनी थी बल्कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया की तुलना में अत्यंत हिंसक और क्रूर थी, जिसे बहुत ख़ामोशी के साथ दबा दिया गया। आज इस घटना के दो साल पूरे होने पर आइए नज़र डालते हैं कि यह क्यों और कैसे शुरू हुआ –

9 दिसंबर

यूं तो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में एनआरसी पर पिछले कई महीनों से बात चल रही थी जब असम में इसके दुरुपयोग और नागरिकों को इसके माध्यम से प्रताड़ित करने के मामले सामने आना शुरू हुए थे। अप्रैल और सितंबर 2019 में इस संबंध में दो बड़े कार्यक्रम कैंपस में आयोजित हुए थे। लेकिन जब नागरिकता संशोधन बिल 9 दिसंबर के दिन संसद में रखा गया, उसी दिन कैंपस में इस पर एक चर्चा आयोजित की गई जिसमें लगभग 200 छात्र/छात्राओं ने शांतिपूर्ण तरीक़े से हिस्सा लिया और बिल की प्रतियां जलाकर अपना विरोध दर्ज कराया।

10 दिसंबर

विश्वविद्यालय प्रशासन की तटस्थता से तंग आकर छात्रों ने टीचर्स एसोसिएशन, नॉन टीचिंग स्टाफ़ एसोसिएशन के साथ-साथ कुलपति को कारण बताओ नोटिस भेजा, स्पष्ट रूप से, सीएबी और एनआरसी के ख़िलाफ़ छात्रों के आंदोलन को समर्थन देने पर उनका रुख़ जानने के लिए। इसी दिन की शाम में 4,000 से अधिक छात्रों ने मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी कैंटीन से विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार बाब-ए-सैयद तक मशाल मार्च निकाला। जिसके परिणाम स्वरूप अलीगढ़ ज़िला प्रशासन द्वारा 500 अज्ञात व 21 नामज़द छात्रों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई।

11 दिसंबर

विश्वविद्यालय के लगभग 20,000 आवासीय छात्रों ने एक दिन की भूख हड़ताल की और अपने-अपने छात्रावासों में डायनिंग हॉल का बहिष्कार किया।

12 दिसंबर

बाब-ए-सैयद पर चल रहे धरने को योगेंद्र यादव, डॉक्टर कफ़ील और फ़वाज़ शाहीन ने संबोधित किया। हालांकि ज़िला प्रशासन और विश्वविद्यालय प्रशासन दोनों ने उन्हें रोकने की कोशिश की थी। उसी शाम महिला छात्रावासों के ताले तोड़कर बड़ी संख्या में छात्राएं भी धरने को समर्थन देने बाब-ए-सैयद पर पहुंची।

13 दिसंबर

शुक्रवार के दिन दोपहर में छात्रसंघ की घोषणा के बाद लगभग 10,000 छात्र अपने हाथों में तिरंगे और एएमयू के झंडे के साथ बाब-ए-सैयद पहुंचे। वे आगे बढ़कर ज़िला प्रशासन तक अपनी बात पहुंचना चाहते थे लेकिन एसएसपी अलीगढ़ ने मौक़े पर पहुंच कर छात्रों को संबोधित किया और उनसे ज्ञापन लिया।

15 दिसंबर

शाम में क़रीब 7 बजे जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पुलिस कारवाई के वीडियोज़ सोशल मीडिया पर आना शुरू हुए। अलीगढ़ में भी छात्रों ने लाइब्रेरी कैंटीन पर एकत्रित होना शुरू कर दिया और वे जामिया के छात्रों के समर्थन में नारे लगाते हुए संगठित होकर बाब-ए-सैयद की तरफ़ बढ़े। उसके बाद जो हुआ, वो आज भी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रों की सामूहिक स्मृति में दर्ज है। रैपिड एक्शन फ़ोर्स और उत्तर प्रदेश पुलिस ने कैंपस में घुसकर जिस तरह उत्पात मचाया, वह भुलाया नहीं जा सकता। लगभग 100 छात्र उस रात पुलिस कारवाई में बुरी तरह घायल हुए, एक शोध छात्र ने अपना हाथ गंवाया, और 26 छात्रों को पुलिस ने उठाया जिन्हें हिरासत में मारा-पीटा गया। यह घटनाक्रम 16 दिसंबर की सुबह तक चला।

पुलिस छात्रावासों में भी घुसी और उनके द्वारा कमरों में आगज़नी की गई। इंटरनेट सेवाएं ठप कर दी गईं और उसी रात एएमयू रजिस्ट्रार द्वारा सभी छात्रों को यूनिवर्सिटी छोड़ने का आदेश दे दिया गया।

16 दिसंबर

अलीगढ़ के स्थानीय लोगों ने रात भर विश्वविद्यालय में हुई पुलिस बर्बरता के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया। उन्होंने बाज़ार बंद किए, रैलियां कीं और हिरासत में लिए गए 26 छात्रों को रिहा करने की मांग की। ज़िला प्रशासन को बहरहाल उनकी मांगें माननी पड़ीं और छात्रों को रिहा किया गया।

18 दिसंबर

विश्वविद्यालय परिसर में मौजूद व स्थानीय छात्रों ने एक बार फिर धरना शुरू किया और 15 दिसंबर को हुई घटना के लिए कुलपति, रजिस्ट्रार और प्रॉक्टर को ज़िम्मेदार ठहराते हुए उनके इस्तीफ़े की मांग की।

19 दिसंबर

शिक्षकों के समूह ने छात्रों के समर्थन में तथा सीएए व एनआरसी के ख़िलाफ़ मार्च निकाला।

22 दिसंबर

छः दिनों के बाद अलीगढ़ में इंटरनेट सेवा बहाल हुई। उसी दिन एक इंटरव्यू में, एएमयू कुलपति ने दावा किया कि उन्होंने पुलिस को अंदर जाने का आदेश नहीं दिया था और छात्रों ने स्वेच्छा से छात्रावास ख़ाली कर दिया था। हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि पुलिस को “असामाजिक तत्वों” का मुक़ाबला करने के लिए बुलाया गया था। इन दोनों बयानों से छात्र समुदाय से कड़ी नाराज़गी जताई।

23 दिसंबर

बड़ी संख्या में स्थानीय छात्रों ने एकत्रित होकर एक विरोध प्रदर्शन किया जिसमें उन्होंने सीएए को वापस लेने के साथ-साथ एएमयू कुलपति के इस्तीफ़े की मांग की।

24 दिसंबर

बीते दिन हुए शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को संज्ञान में लेते हुए 1200 अज्ञात छात्रों के ख़िलाफ़ ज़िला प्रशासन ने एफ़आईआर दर्ज की।

ये आंदोलन लंबे समय तक चला। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मामले का संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को इसकी जांच सौंपी। हाइकोर्ट ने पुलिस और रैपिड एक्शन फ़ोर्स द्वारा की गई कार्रवाई को भी अनुचित ठहराया और ये कहा कि उस रात पुलिस ने “युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी थी।” 

इन घटनाओं के बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में विरोध के स्वरों को दबाने के लिए इस्तेमाल में लाया जा रहा नया पैटर्न सामने आया। हज़ारों अज्ञात और सैकड़ों नामज़द एफ़आईआर दर्ज की गईं। अनेक छात्रों के घर लीगल नोटिस भेजे गए। विश्वविद्यालय परिसर का एक तरह से ‘सैन्यीकरण’ शुरू हुआ जिसके माध्यम से छात्रों में यह डर बैठाया गया कि पुलिस कभी भी कैंपस में घुसकर जो चाहे कर सकती है। और इस पूरे घटनाक्रम को विश्वविद्यालय प्रशासन और शिक्षकों का मौन समर्थन प्राप्त रहा।

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