[पुस्तक समीक्षा] अल्लाह मियाँ का कारख़ाना

उपन्यास की भाषा बहुत स्पष्ट, साधारण एवं मधुर है कि औसत और मध्यम स्तर के पाठक भी इसे सुगमता के साथ समझ सकते हैं। ऐसा महसूस होता है कि लंबे समय के बाद ऐसा उपन्यास सामने आया है जिसे केवल फ़िक्शन कहना उस के पक्ष में नाइंसाफ़ी होगी। यह एक बच्चे की कहानी है जिसे एक अरुचिकर पाठक भी जोश के साथ पढ़ने के लिए उत्सुक हो जाता है।

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पुस्तक का नाम – अल्लाह मियां का कारख़ाना

लेखक – मोहसिन ख़ान

भाषा – हिन्दी (मूलतः उर्दू)

हिन्दी प्रकाशक – काव्या पब्लिकेशन्स

प्रकाशन वर्ष – 2021

मूल्य – 260/-

मोहसिन ख़ान उर्दू के एक प्रसिद्ध कहानीकार एवं उपन्यासकार हैं, जो युवाओं के लेखक होने के साथ-साथ बच्चों के लेखक भी हैं। बच्चों के मनोविज्ञान पर उनकी काफ़ी मज़बूत पकड़ है, जिसका बेहतरीन नमूना उनका एक प्रसिद्ध उपन्यास “ज़ोहरा” है जिसे बहुत तेज़ी के साथ न केवल उर्दू में बल्कि अंग्रेज़ी में भी प्रसिद्धि प्राप्त हुई।

पिछले कुछ समय से उनका उपन्यास “अल्लाह मियां का कारख़ाना” पाठकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस उपन्यास पर अत्यंत कम समय में ही समालोचनात्मक, विश्लेषणात्मक एवं प्रभावात्मक टिप्पणियां की जा चुकी हैं। उपन्यास बहुत आसान, प्रवाहकीय और रुचिकर है कि यह अपनी विशेषताओं की वजह से पाठकों को बिना किसी कठिनाई और जटिलता के एक ही आवेग एवं उत्सुकता के साथ समापन के लिए आकर्षित करता है।

उपन्यास की भाषा बहुत स्पष्ट, साधारण एवं मधुर है कि औसत और मध्यम स्तर के पाठक भी इसे सुगमता के साथ समझ सकते हैं। ऐसा महसूस होता है कि लंबे समय के बाद ऐसा उपन्यास सामने आया है जिसे केवल फ़िक्शन कहना उस के पक्ष में नाइंसाफ़ी होगी। यह एक बच्चे की कहानी है जिसे एक अरुचिकर पाठक भी जोश के साथ पढ़ने के लिए उत्सुक हो जाता है। आम तौर पर उपन्यास इतने जटिल एवं विस्तृत होते हैं कि उनकी अलंकृत गुत्थियों को सुलझाते-सुलझाते ही पाठक अपनी रुचि खो चुका होता है और जब तक कुछ अर्थ समझ आना शुरू होता है तब तक कहानी से उसका संपर्क टूट चुका होता है।

मोहसिन ख़ान का उपन्यास एक स्ट्रेट फ़ॉरवर्ड उपन्यास है जो कि अपनी प्रकृति पर आधारित है जिसके प्लॉट एवं क़िस्सों में किसी तरह का कोई उलझाव और घुमाव नहीं पाया जाता, जिसे समझने में किसी कठिनाई का सामना करना पड़े। चूंकि यह एक बच्चे की कहानी है इसलिए वाक्यों का उपयोग भी उसी तरह मासूमियत, बेधड़क और बेबाक, छोटे-छोटे, नादान लेकिन दिलचस्प सवालों की तरह किया गया है। जैसे,

अल्लाह मियां कहां रहते हैं?

अल्लाह मियां सब जगह रहते हैं तो हमको दिखाई क्यों नहीं देते?

अल्लाह मियां ने यह दुनिया क्यों बनाई?

छः दिन क्यों लगाए, अल्लाह मियां तो एक दिन में बना सकते थे?

अल्लाह मियां ने मुर्गी बनाई थी तो बिल्ली क्यों बनाई?

जब सब कुछ अल्लाह मियां की मर्ज़ी से होता है तो फिर अब्बा ने आप की पटरी टेढ़ी क्यों बना दी?

अल्लाह मियां किसी को अमीर, किसी को ग़रीब क्यों बना देते है?

क्या मुर्ग़ी अपने चूज़ों को दूध नहीं पिलाती?

क्या सफ़ेद मुर्ग़ी के अंडों से सफ़ेद चूज़े निकलते हैं?

क्या तुम्हारी बकरी मुसलमान है?

अगर मुसलमान नहीं है तो उसकी इतनी बड़ी दाढ़ी क्यों है?

अगर तुम्हारी गाय के तिलक लगा दिया जाए तो क्या वह हिंदू हो जाएगी?वगैरह-वगैरह…

बच्चों के मन में प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाले इस तरह के ढेरों बचकाने और जिज्ञासा भरे मासूम सवालों पर आधारित इस उपन्यास में अधिकतर पाठक अपने भोले-भाले बचपन के बेफ़िक्र और मासूम समय की झलकियों को महसूस कर सकते हैं। मोहसिन ख़ान एक जगह पर कहते भी हैं कि “बचपन की बातें सारी ज़िंदगी इंसान के ज़हन में पागुर होती रहती हैं।” उपन्यास में फ़िक्शन का वह जादू है जिसे पढ़कर पाठक क़दम-क़दम पर मुस्कुराकर या उदास होकर अपने भावों को व्यक्त करता है।

सबसे पहले तो इस उपन्यास का शीर्षक ही इतना दिलचस्प है कि पाठक स्वयं ही इसकी तरफ़ आकर्षित हो जाता है। उपन्यास एक मासूम बच्चे की शोकपूर्ण कथा है जिसकी भावनात्मकता को पाठक अत्यंत गहराई से महसूस कर उसकी सतह में उतरता चला जाता है। यह कहानी एक 9-10 साल के ग़रीब मुस्लिम लड़के “जिबरान” की है। जिबरान ही इस उपन्यास का मुख्य चरित्र है, जो छोटी-सी उम्र में अनाथ हो जाता है। यह कहानी उस बच्चे की दुखद कथा है, जो अनाथ होने के बाद दर-बदर ठोकरें खाता है। जो बहुत अधिक कष्टों, दुखों और कठिनाइयों का सामना करता है। पहले तो उसके पिता को पुलिस आतंकवादी होने के शक में पकड़ कर ले जाती है और फिर उसके कुछ दिन बाद उसकी गर्भवती मां भूख-प्यास, कमज़ोरी और पति के शोक में तड़प-तड़प कर उसकी आंखों के सामने प्राण त्याग देती है। मोहसिन ख़ान ने दुख के अथाह सागर को एक वाक्य में इस प्रकार व्यक्त किया है कि “मां के मरने का ग़म क्या होता है, यह वही जान सकता है जिसकी मां मर गई हो।”

मोहसिन ख़ान ने अपने इस उपन्यास में हिंदुस्तान के मुस्लिम समाज के ग़रीब श्रेणी की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षिक एवं पारिवारिक जीवन की समस्याओं का चित्रण अत्यंत साधारण एवं विनम्र रूप में किया है। उपन्यास पढ़कर पाठक स्वयं ही समाज के मानसिक पिछड़ेपन का अंदाज़ा लगा सकता है। लेखक ने उपन्यास में नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनों ही प्रकार के चरित्रों का उपयोग किया है लेकिन उन्होंने स्पष्ट रूप से इसे चिन्हित न करते हुए अच्छाईयों एवं बुराईयों का फ़ैसला पाठकों के हाथ में सौंप दिया है। मोहसिन ख़ान ने उपन्यास में कहीं पर भी हुकूमत पर कोई व्यंगोक्ति एवं निंदा नहीं की है, न ही उसे स्पष्ट शब्दों में उग्र कहा है। लेकिन उनका जिबरान के पिता को केवल एक शक के आधार पर जेल में डाल देना हुकूमत का क्रूर हिंसात्मक एवं धूर्त रूप उजागर करने के लिए पर्याप्त है।

जिबरान के मां-बाप का साया सिर से उठ जाने के बाद वह और उसकी बहन “नुसरत” जो उम्र में बारह-तेरह साल की रही होगी अपने चाचा और चाची के घर रहने लगते हैं। नुसरत इतनी कम उम्र में उनके घर की सारी देख-रेख संभालने लगती है। जिबरान के साथी, पतंगें, खेल-कूद और मदरसा सब छूट जाता है, यहां तक कि उसकी बहन नुसरत भी उससे अलग हो जाती है। चाचा की मृत्यु के बाद जब चाची उस को घर से निकाल देती हैं तो हाफ़िज़ जी ही उसके सर पर हाथ रखते हैं। हाफ़िज़ जी जिबरान के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार करते हैं। वह उसकी परवरिश करते हैं, उसके सोने-जागने, शिक्षा-दीक्षा, खान-पान, कपड़े-चप्पल आदि का भी ध्यान रखते हैं। शुरुआत में ऐसा महसूस होता है कि हाफ़िज़ जी एक कठोर हृदय वाले निर्दयी इंसान हैं जो क़ुरआन पढ़ाते समय बच्चों पर इबरत की छड़ियां बरसाते हैं लेकिन अंत तक पहुंचने पर उनका उत्तम चरित्र स्पष्ट होता चला जाता है। एक समय तक साथ रहने के बाद जब हाफ़िज़ जी अपने गृह नगर जाने इरादा करते हैं तब जिबरान अपने धैर्य की अंतिम सीमा पर पहुंच जाता है और वह इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाता है। अत्यंत तेज़ बुखार की स्थिति में वह स्वप्न देखता है कि उसकी मरी हुई मां उसे लेने आईं हैं और जिबरान के जीवन का चिराग़ बुझ जाता है।

समीक्षक: उम्मे रूमान

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