भीड़तंत्र में भी इंसानियत को मजबूत रखिए.

हम इतने निकम्मे हैं कि जीवन मे एक इंसान सुधार नही सकते,हाँ मार सकते हैं । अपनी औलाद तक को नही सिखाते की तुम्हे समाज से कैसे पेश आना है, हर लिंग के इंसान की इज़्ज़त करनी है, हर धर्म के लोगों का सम्मान करना है, हम इतने फूहड़ हैं कि अपने से अलग हर चीज़ को मिटा डालना चाहते हैं, मसल डालना चाहते हैं ।

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कार्टून-शारिक अहमद

किसी को लग रहा है कि एक लड़की दुष्कर्म के बाद जलाकर मार डाली गई । कोई को लग रहा चार आरोपी लड़के एनकाउंटर में मार दिए गए । कोई लड़की का धर्म उठा उठा कर अफसोस कर रहा था,तो कोई आरोपियों में से एक के धर्म को निशाना लेकर तमाशा कर रहा था । सच पूछो लोगों दर्द भले हुआ हो मगर वह ऐसे हालात को सुधारने वालों में से नही थे, उन्हें किसी की कोई परवाह नही,बस हुल्लड़,हुड़दंग और तमाशे बस ।

अगर देश की चिंता होती,तो यह समझते हमारे देश के पाँच लोग मार डाले गए,अगर हमने सभ्य समाज बनाया होता,तो पांचों ज़िन्दा होते और समाज के काम आ रहे होते । चार अपराध के रास्ते पर नही जाते और पाँचवी मासूम लड़की की जान भी नही जाती । इतनी भीड़ से मारने काटने की ही आवाज़ें आईं, कोई सुधारने की तरफ नही बढ़ा ।

हम इतने निकम्मे हैं कि जीवन मे एक इंसान सुधार नही सकते,हाँ मार सकते हैं । अपनी औलाद तक को नही सिखाते की तुम्हे समाज से कैसे पेश आना है, हर लिंग के इंसान की इज़्ज़त करनी है, हर धर्म के लोगों का सम्मान करना है, हम इतने फूहड़ हैं कि अपने से अलग हर चीज़ को मिटा डालना चाहते हैं, मसल डालना चाहते हैं ।

कुछ बातों पर हमें लगता है कि क्या ही कहें,वक़्त इनकी उत्तेजना का उत्तर होगा । आज जो एनकाउंटर अच्छा लग रहा,कल जब यह विवेक तिवारी एनकाउंटर की तरह उनकी चौखट पर आएगा तो बिलबिलाकर रोएँगे । अगर पुलिस की हर थ्योरी सही मानते हैं यह,तो देश के गृह मंत्री समेत कई लीडर कब का निपट चुके होते । न्यायपालिका थी जिसने आज उनको सम्मानजनक जीवन जीने का मौका दिया और आपको उनमें खुदका नेतृत्व दिखाई दे सका । देश के प्रधानमंत्री भी दंगो के आरोपों से न्यायपालिका से ही क्लीनचिट पाए हैं, पुलिस से नही,पुलिस की थ्योरी सही होती तो राजनीतिक नक्शे कुछ और होते ।

ठीक है आप उबलकर आज एनकाउंटर को सही ठहरा रहें हैं मगर यह बड़ी नाज़ुक डगर है । जब पुलिस आपके घर के लड़के को किसी भी जुर्म में पकड़ ले तो प्लीज़ कोर्ट कचहरी के चक्कर मत लगाइएगा, वकील के पास वक़्त मत बर्बाद कीजियेगा,पुलिस से कहिएगा की ऑन द स्पॉट फ़ैसला करो । जब यह कर लीजिएगा,तब यह गणतंत्र से गनतंत्र बनने की प्रक्रिया को सही ठहरायेगा ।

मेरे ऊपर तो अब कोई फर्क नही पड़ता कि कौन विरोध में है और कौन समर्थन में, मेरा स्टैंड एक है सँविधान, जिसे छोड़कर जाना है, चला जाए,कल जाना हो तो आज ही जाए । जो बलात्कार में धर्म खोजकर उद्वेलित हों,जाति खोजकर चीखें वरना खामोश हो जाएं,उनके समर्थन या विरोध का हमपर असर नही होता है । आप तो सरकार के उस नागरिकता संशोधन बिल को भी अमृत समझ पी जाएँगे । आप तो NRC में गरीब गुरबों को बाहर निकलता देख ठहाके लगाएँगे । आप तो आदिवासी लड़कियों के लिए लड़ने वाली आवाज़ों में अर्बन नक्सल देख मुट्ठियाँ भीचेंगे, आप पर सिर्फ तरस खाया जा सकता है । आपका एनकाउंटर पर फूलों की बारिश करना हमे ज़रा भी विचलित नही करता है, एक अराजक और बर्बर समाज ऐसा ही होता है । जहां कोई किसी को भी जला कर मार दे,जहां कोई कहीं भी बिना सुनवाई के गोलियों से मारकर फैसला सुना दी । सभ्य समाज तो वह है, जो विधान से चलता है, जहां न्याय होता है ।

आप मज़े कीजिये एनकाउंटर के,हम अफसोस करेंगे कि एक लड़की और आज सुबह मर गई । लड़ना है तो ढंग की पारदर्शी और तेज़ न्याय की माँग करिए । पुलिस पारदर्शी विवेचना करे और कोर्ट कम वक्त में न्याय दे,इसके अलावा हर हथकंडा हमारे समाज का नासूर बनेगा । हाँ एक बार बेशर्मी अगर न हो,तो आईने में पलटकर देखिएगा की किस पोलिटिकल पार्टी ने सबसे ज़्यादा ब्लात्कार के आरोपी और दूसरे अपराधियों को माननीय बनवाया है और उसमें आपका वोट है या नही,आप खुश होइए,हम दुःखी होंगे कि हम अपने नागरिकों को सुधार पाने के सलीके भी खो बैठे । अभी तो वह दिन भी देखिएगा जब आपका बच्चा होमवर्क नही पूरा करेगा और टीचर उसे गोली मार देंगे,क्योंकि सुधारने वाली प्रक्रिया हम दिन बदिन खोते जा रहे हैं । जो समाज सुधरना बन्द कर देगा,वह सड़ता चला जाएगा । आपका न्यायपालिका को झुठलाकर की गई हत्याओं पर हर्ष वही सड़ने की सड़ांध है ।

Hafeez Kidwai

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