पीर मुहम्मद मूनिस : क़लम का सत्याग्रही

30 मई, 1882 में बेतिया शहर के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे पीर मुहम्मद मूनिस को दुनिया ‘क़लम के सत्याग्रही’ के नाम से जानती है। वे स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय क्रांतिकारी, प्रसिद्ध पत्रकार और साहित्यकार थे। चम्पारण सत्याग्रह की पृष्ठभूमि तैयार करने व गांधी जी को चम्पारण लाने में उनकी अविस्मरणीय भूमिका रही, लेकिन विडंबना यह है कि देश क़लम के इस सत्याग्रही को आज पूरी तरह से भूल चुका है।

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पीर मुहम्मद मूनिस : क़लम का सत्याग्रही

अफ़रोज़ आलम साहिल

हमारे देश में ऐसे अनेक नायक हैं, जिन्हें हमने भुला दिया है। भाजपा के सत्ता में आने के बाद यह तस्वीर कुछ बदली तो ज़रूर है। बहुत-से पुराने नायकों को याद किया जा रहा है। उन्हें पुरस्कृत किया जा रहा है। उनकी झूठी ब्रांडिंग की जा रही है। लेकिन यह भी क्या अजीब विडंबना है कि जो देश के असल नायक थे, उन्हें आज भी कोई याद करने को तैयार नहीं है।

आज मुझे उस शख़्स की याद आ रही है, जिसने अपना सारा जीवन देश की आज़ादी के आंदोलन में लगा दिया, जिसके जीवन का असल मक़सद देश में हिन्दू-मुस्लिम एकता को क़ायम रखना था, जिसने वतन के ख़ातिर अपना सब-कुछ त्याग दिया। उस सच्चे देशभक्त का नाम है – पीर मुहम्मद मूनिस।

पीर मुहम्मद मूनिस को दुनिया ‘क़लम के सत्याग्रही’ के नाम से जानती है। चम्पारण सत्याग्रह की पृष्ठभूमि तैयार करने व गांधी जी को चम्पारण लाने में पीर मुहम्मद मुनिस की भूमिका अविस्मरणीय रही है लेकिन हैरान कर देने वाली बात यह है कि आज चम्पारण क़लम के इस सत्याग्रही को पूरी तरह से भूल चुका है। युवा पीढ़ी की बात तो दूर, शहर के बुज़ुर्गों को भी उनका नाम कुछ ख़ास याद नहीं है।

पीर मुहम्मद मूनिस का जन्म 30 मई, 1882 में बेतिया शहर के एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम फतिंगन मियां था। मूनिस बचपन से ही इंक़लाब पसंद इंसान थे। अंग्रेज़ी राज को उनकी क़लम पसंद नहीं आई और सरकार द्वारा उन्हें आंतकी पत्रकार घोषित कर दिया गया। ब्रिटिश दस्तावेज़ों के मुताबिक़ – “पीर मुहम्मद मूनिस अपने संदेहास्पद साहित्य के ज़रिये चम्पारण जैसे बिहार के पीड़ित क्षेत्र से देश-दुनिया को अवगत कराने वाला और मिस्टर गांधी को चम्पारण आने के लिए प्रेरित करने वाला ख़तरनाक और बदमाश पत्रकार था।”

मूनिस एक शिक्षक थे, मगर अंग्रेज़ उन्हें गुंडा बताकर पुलिस के चंगुल में फंसाने की असफल कोशिशें करते रहे। मूनिस का ज़िक्र राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक ‘मेरे असहयोग आंदोलन के साथी’ में विस्तार से किया है। वे हिन्दी भाषा के एक अच्छे लेखक और साहित्य प्रेमी थे। बल्कि वास्तव में वे बिहार में अभियानी हिंदी पत्रकारिता के जनक थे। लेकिन यह विडंबना ही है कि पत्रकारिता की किताबों में उनका ज़िक्र शायद ही कहीं मिले। एक मुसलमान होते हुए भी वे हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए जी-जान से लगे रहे। हिन्दू-मुस्लिम एकता के हिमायती पीर मुहम्मद मूनिस ने उस दौरान दंगों की रिपोर्टिंग करते वक़्त पंडितों और मौलवियों की करतूतों को ख़ूब उजागर किया था।

हिंदी साहित्य और पत्रकारिता के विकास में उनका योगदान उल्लेखनीय है। जिस दौर में भारत में उर्दू, फ़ारसी व अंग्रेज़ी का बोलबाला था, उस दौर में पीर मुहम्मद मूनिस ने हिंदी को अपने लेखन की भाषा चुना और हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाए जाने की वकालत की। 1909 में ‘कर्मयोगी’ में ‘राष्ट्र भाषा हिंदी हो’ शीर्षक से उनका एक लेख छपा जिसे पढ़कर उस दौर के दिग्गज लेखक बालकृष्ण भट्ट ने कहा था कि, “तुम लिखा करो और हमेशा लिखा करो, कुछ दिनों में तुम्हारी भाषा और शैली की क़द्र होगी।” 1917 में अष्टम हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग ने एक लेखमाला प्रकाशित की थी, उसमें मूनिस का भी एक लेख शामिल था, शीर्षक था कि ‘क्या उर्दू हिंदी से भिन्न कोई भाषा है?’ इसमें उन्होंने हिंदी-उर्दू के अभेद को रेखांकित किया, जिस पर आगे चलकर प्रेमचंद सहित कई हिंदी लेखकों के विचार सामने आए।

मूनिस का हिंदी के प्रति ऐसा अनन्य प्रेम था कि तमाम प्रतिकूलताओं को दरकिनार कर वह बिहार प्रांतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन के संस्थापकों में शामिल रहे और नियमित उसकी गतिविधियों में रचनात्मक रूप से जुड़े रहे। 1937 में वे बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के पंद्रहवें अध्यक्ष बनाए गए। रामवृक्ष बेनीपुरी ने बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के 22वें अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए कहा था कि, “इस आसन पर आते ही मेरी आंखों के सामने इस सम्मेलन के शुभारंभ के दिन मूर्तियान हो उठते हैं, जब मैं बच्चा था और स्कूल में पढ़ता था, जब भाई मूनिस जी पूज्य राजेन्द्र बाबू से प्रेरणा लेकर पटना से लौटते समय मुज़फ़्फ़रपुर पधारे थे और वहां के साहित्यिक बंधुओं से इस सम्मेलन के स्थापना की बात चलाई थी…”

आचार्य शिवपूजन सहाय अपने एक लेख में लिखते हैं कि, “मुसलमान होकर हिंदी की ख़ातिर मूनिस ने जो आत्मात्सर्ग किया, उसका ऋण चुकाना हिंदी प्रेमियों का कर्तव्य है। उर्दू का सहारा पकड़ते, तो शायद ग़रीबी का दंश न सहते।”

मूनिस हिंदी के प्रचार-प्रसार में ग़ैर हिंदी क्षेत्रों व गांवों में विशेष ज़ोर देना चाहते थे तथा इसके लिए उन्होंने जी-जान से लग जाने की अपील आरा सम्मेलन में अपने अध्यक्षीय व्याख्यान में की थी। पुस्तकालयों का जाल बुनकर तथा गांवों की दुर्दशा का हवाला देकर उसके जीवन स्तर को सुधारने पर भी बल दिया था। इस तरह भाषा के सवाल को वे जनता के सवाल से अलग नहीं मानते थे। इस भाषण में भी उन्होंने हिंदी-उर्दू की अभेद स्थिति पर विचार व्यक्त किया था और भाषा को जनसामान्य से जोड़ने की वकालत की थी।

अपने समय के महान क्रांतिकारी लेखक राधामोहन गोकुल जिन्हें निराला अपना गुरू मानते थे, पीर मुहम्मद मूनिस के लेखन के मुरीद थे। इनके अलावा पं. बालकृष्ण भट्ट, पं. सुंदरलाल, गणेश शंकर विद्यार्थी, कवि सत्यनारायण, कविरत्न बालकृष्ण शर्मा, नवीन, स्वामी सत्यदेव, महात्मा मुंशीराम, पं. माधव शुक्ल, आचार्य शिवपूजन सहाय और बनारसीदास चतुर्वेदी जैसी तत्कालीन हिन्दी हस्तियां मूनिस जी की अंतरंग आत्मीय दुनिया में शामिल थीं।

उनके लेख उस दौर में प्रसिद्ध ‘नया ज़माना’, ‘नव जीवन’, ‘स्वदेश’, ‘पाटलिपुत्र’ जैसी दर्जनों पत्रिकाओं व अख़बारों में छपते रहे। मूनिस कानपुर से निकलने वाले ‘प्रताप’ अख़बार के संवाददाता भी थे, जिसके संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी थे। उनके लेखों की वजह से अंग्रेज़ी सरकार द्वारा ‘प्रताप’ अख़बार को भी प्रताड़ित किया जा रहा था। पीर मुहम्मद मूनिस ने भी चम्पारण में अंग्रेज़ों के ज़रिए निलहों पर होने वाले अत्याचार को सामने लाने के लिए जेल की सज़ा भुगतनी पड़ी। वे अपनी नौकरी से बर्ख़ास्त हुए और उनकी संपत्ति तक ज़ब्त हो गई।

गणेश शंकर विद्यार्थी ने 15 फ़रवरी, 1921 को ‘प्रताप’ में लिखा था कि, “हमें कुछ ऐसी आत्माओं के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त है जो एक कोने में चुपचाप पड़ी रहती हैं। संसार उनके विषय में कुछ नहीं जान पाता। इन गुदड़ी के लालों का जितना कम नाम होता है, उनका कार्य उतना ही महान, उतना ही लोकोपकारी। वे छिपे रहेंगे। प्रसिद्धि के समय दूसरों को आगे कर देंगे। किंतु कार्य करने एवं कठिनाईयों को झेलने के लिए सबसे आगे दौड़ पड़ेंगे। श्रीयुत पीर मुहम्मद मूनिस भी एक ऐसी ही आत्माओं में से थे। आप उन आत्माओं में से थे जो काम करना जानते थे। चम्पारण के नीलहे गोरों का अत्याचार चम्पारण-वासियों को बहुत दिनों से असहनीय कष्ट सागर में डाले हुए था। देश के किसी भी नेता का ध्यान उधर को न गया, किंतु मित्रवर पीर मुहम्मद बेतिया-चम्पारण वासियों की दशा पर आठ-आठ आंसू रोए थे। आप ही ने महात्मा गांधी को चम्पारण की करुण कहानी सुनाई और वह आपके ही अथक परिश्रम का फल था कि महात्मा गांधी की चरणरज से चम्पारण की भूमि पुनित हुई थी…”

पीर मुहम्मद मूनिस के जीवन पर आधारित लेखक की किताब

पीर मुहम्मद मूनिस ने अंग्रेज़ों की हक़ीक़त को बयान करते हुए अपनी पुस्तक ‘चम्पारण की प्रजा पर अत्याचार’ लिखी थी, जिसे अंग्रेज़ों ने ज़ब्त कर लिया था। वह पुस्तक आज तक नहीं मिली। चूंकि पीर मुहम्मद मूनिस भारत को अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से मुक्त कराना चाहते थे और उन्हें अंग्रेज़ों से सख़्त नफ़रत थी, इसीलिए उन्होंने अपने लेखों के ज़रिए 1905 से 1911 तक जितनी बातों को अवाम के सामने रखा, वो पूरे हिन्दुस्तान में काफ़ी प्रसिद्ध हुए।

1907 में जब चम्पारण के चांद बरवां साठी के रहने वाले शेख़ गुलाब ने अंग्रेज़ निलहों के ख़िलाफ़ खुला ऐलान-ए-जंग कर दिया तो उस समय इस जंग की तमाम ख़ुफ़िया बैठकें बेतिया में पीर मुहम्मद मूनिस के घर पर ही हुआ करती थीं। गांधी जी जब निलहे अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जंग करने के लिए चम्पारण आए तो पीर मुहम्मद मूनिस गांधी जी के साथ साये की तरह रहे। उन्होंने ख़ुद गांधी जी के लिए रोटियां पकाईं, उन्हें खिलाईं और उनके साथ इस लड़ाई में एक दिलेर ख़ादिम की हैसियत से काम करते रहे। वह पूरी ज़िंदगी ‘अंग्रेज़ भगाओ और भारत को आज़ाद कराओ’ के मिशन पर लगे रहे। गांधी जी भी उन्हें दिल-ओ-जान से मानते थे और उनका सम्मान करते थे। गांधी जी जब पहली बार 23 अप्रैल 1917 को बेतिया पहुंचे तो हज़ारीमल धर्मशाला में थोड़ा रूक कर सीधे पीर मुहम्मद मूनिस के घर उनकी मां से मिलने पैदल चल पड़े। वहां मूनिस के अनेक मित्रों ने गांधी जी का अभिनंदन किया। चम्पारण में गांधी जी को सबसे अधिक परेशानी हिंदी भाषा को लेकर आई, क्योंकि उन्हें हिंदी नहीं आती थी। कहा जाता है कि उन्होंने चम्पारण में ही ख़ूब जतन से हिंदी सीखी। इसमें पीर मुहम्मद मूनिस ने उनकी सबसे अधिक मदद की।

अंग्रेज़ों ने गांधी जी को मदद करने वाले 32 लोगों की एक सूची तैयार की थी, जिसमें दसवां नाम पीर मुहम्मद मूनिस का था। (ऊपर के 9 नाम चम्पारण के बाहर के लोगों के थे) इसका ज़िक्र 12 सितम्बर 1917 को चम्पारण के सुप्रीटेंडेंट ऑफ़ पुलिस सी. एम. मारशम द्वारा तिरहुत डीविज़न के कमिश्नर एल. एफ़. मॉरशेद को लिखे एक पत्र में मिलता है। इस पत्र में मूनिस के बारे में ये भी लिखा है कि, “बेतिया का पीर मुहम्मद मूनिस, जिसके पास कुछ नहीं है, जिसका कोई स्तर नहीं है, एक ख़तरनाक व्यक्ति है, और व्यवहारतः बदमाश है।”

एक और पत्र में पीर मुहम्मद मूनिस के बारे में अंग्रेज़ों ने लिखा है कि, “गांधी को मदद पहुंचाने में पीर मुहम्मद सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है। जहां तक मैं समझता हूं, वो बेतिया राज स्कूल में शिक्षक था। उसे उसके पद से बर्ख़ास्त किया गया, क्योंकि वह 1915 या उसके आस-पास स्थानीय प्रशासन के ख़िलाफ़ हमलावर लेख प्रकाशित कराता था। वो बेतिया में रहता है और लखनऊ के ‘प्रताप’ में संवाददाता के रूप में काम करता है। ‘प्रताप’ एक ऐसा अख़बार है, जो चम्पारण के प्रश्न पर उग्र विचार देता है। पीर मुहम्मद बेतिया के शिक्षित, अर्द्ध-शिक्षित रैयतों तथा रैयत नेताओं के बीच कड़ी का काम करता है।” ये पत्र बेतिया के सब-डिवीज़नल ऑफ़िसर डब्ल्यू. एच. लेविस ने तिरहुत डीविज़न के कमिश्नर को लिखा था। यहां यह स्पष्ट रहे कि डब्ल्यू. एच. लेविस को यह नहीं मालूम था कि ‘प्रताप’ लखनऊ से नहीं, कानपुर से निकलता है और मूनिस बेतिया राज स्कूल के शिक्षक नहीं, बल्कि गुरू ट्रेनिंग स्कूल में शिक्षक थे।

1921 में चम्पारण में कांग्रेस की स्थापना के साथ ही मूनिस कांग्रेस से पूरी तरह जुड़ गए और मरते दम तक कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा। 1937 में कांग्रेस के टिकट पर चम्पारण डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सदस्य चुने गए और बेतिया लोकल बोर्ड के चेयरमैन बने। पीर मुहम्मद मूनिस को किसी पद का लालच कभी नहीं रहा, इसीलिए 1939 में चेयरमैन पद से इस्तीफ़ा दे दिया और अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ सत्याग्रह में पूरी तरह से लग गए। इसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा। वह इससे पहले भी नमक आंदोलन के समय 1930 में पटना कैंप जेल में तीन महीने की सज़ा काट चुके थे। मूनिस न सिर्फ़ जेल गए बल्कि अंग्रेज़ों ने उनकी पूरी जायदाद ज़ब्त कर ली। पूरा घर बर्बाद हो गया।‌ मगर उन्होंने कभी इसकी फ़िक्र नहीं की।

उन्होंने अपना पूरा जीवन सत्याग्रह आंदोलन में लगा दिया। देश की आज़ादी के लिए पूरा जीवन अभाव में जिया और अभाव में ही 23 दिसम्बर, 1949 को दिवंगत हो गए। हालांकि उनके आख़िरी वारिस, उनकी पोती हाजरा ख़ातून के पति को इस तारीख़ पर आपत्ति है। उनका कहना है कि निधन की तारीख़ 24 दिसम्बर नहीं बल्कि 14 अगस्त है।

मुहम्मद मुस्तफ़ा उर्फ़ भोला फ़ुटबॉलर बताते हैं कि, “वे हमारे बचपन के दिन थे। हमें याद है कि वो दिन 14 अगस्त था और दादा को 15 अगस्त के रेडियो प्रोग्राम के लिए जाना था। ऑल इंडिया रेडियो वाले पटना से उन्हें लेने आने वाले थे। वो उन्हीं के इंतज़ार में बैठे थे। अचानक हार्ट अटैक की वजह से इस दुनिया को हमेशा को लिए छोड़कर चले गए। यह कहानी सिर्फ़ मुझे ही याद नहीं, बल्कि मेरे अब्बू ने भी कई बार सुनाई है और मेरी बीवी‌ हाजरा भी यही बताती हैं। पता नहीं लोगों ने 23/24 दिसम्बर कहां से ला दिया!”

वो बताते हैं कि, “पीर मुहम्मद मूनिस के आख़िरी वारिसों में सिर्फ़ दो पोता-पोती थे। पोता मुहम्मद क़ासिम और पोती हाजरा ख़ातून। क़ासिम कुछ साल पहले अल्लाह को प्यारे हो चुके हैं।‌” वो सरकार पर रोष व्यक्त करते हुए कहते हैं कि, “सरकार ने इस सच्चे देशभक्त को हमेशा के लिए भुला दिया है। लोग बताते हैं कि उनके नाम पर मेरे घर के सामने वाले रोड का नामकरण किया गया था, लेकिन सरकार ने आज तक कोई बोर्ड नहीं लगाया गया, जिसकी वजह से यह अस्पताल रोड के नाम से ही जाना जाता है, और अब कुछ लोग इसे जायसवाल रोड का नाम देने लगे हैं।” (इस बात की पुष्टि लेखक स्व. डॉ. शोभाकांत झा ने भी की थी। उनके मुताबिक़ बेतिया के हॉस्पिटल रोड का नाम पीर मुहम्मद मूनिस रोड है।)

जेपी आंदोलनकारी व समाजसेवी ठाकुर प्रसाद त्यागी कहते हैं कि, “सरकार को बेतिया रेलवे स्टेशन का नाम पीर मुहम्मद मूनिस के नाम पर रखना चाहिए ताकि देश की युवा पीढ़ी चम्पारण के गौरवशाली इतिहास और आज़ादी के दीवानों को जान सके।”

आज़ादी मिलने के बाद देश में कांग्रेस की ही सरकार बनी। डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने, जिनके साथ ही रहकर पीर मुहम्मद मूनिस ने अपनी ज़िंदगी का अधिकतर हिस्सा गुज़ारा था। मगर किसी ने भी उनकी ग़रीबी और परेशानी की तरफ़ ध्यान नहीं दिया और न ही अंग्रेज़ों द्वारा ज़ब्त की गई उनकी सम्पत्ति को किसी ने वापस दिलाया।

यह इस देश का दुर्भाग्य ही है कि जिन्होंने देश के साथ ग़द्दारी की, जिन्होंने अंग्रेज़ों के साथ मिलकर देशभक्तों को फांसी पर लटका दिया, वे आज पुरस्कृत किए जा रहे हैं और जिन्होंने इस देश के लिए अपना सब-कुछ बलिदान कर दिया, उन्हें कोई जानता तक नहीं। इसके लिए ज़िम्मेदार हम भी हैं। पीर मुहम्मद मूनिस ने कभी कहा था – “वही भाषा जीवित और जागृत रह सकती है जो जनता का ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व कर सके।” लेकिन मेरा मानना है कि इतिहास में वही व्यक्ति जावित रह सकता है, जिसे उसकी क़ौम याद रखे।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार हैं और ‘पीर मुहम्मद मूनिस’ के जीवन पर एक किताब भी लिख चुके हैं।)

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