भारतीय शिक्षा व्यवस्था और कहानी “6%” की

पिछले दो दशकों में भारत के शिक्षा क्षेत्र में स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और नामांकन के मामले में बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है। इस विस्तार ने दो समस्याएं उत्पन्न कीं :- न्यायसंगत हिस्सेदारी (इक्विटी) और गुणवत्ता की कमी। इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए  देश की शिक्षा व्यवस्था को उचित धन ख़र्च करने की आवश्यकता है। शिक्षा क्षेत्र के लिए बजट इस दिशा में पहला क़दम हो सकता है।

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भारतीय शिक्षा व्यवस्था और कहानी “6%” की

सआदत हुसैन (शोध छात्र, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय)

01 फ़रवरी 2023 को वित्त मंत्रालय ने वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए केंद्रीय बजट की घोषणा की। अगले दिन विभिन्न समाचार पत्रों और वेब पोर्टलों ने केंद्रीय बजट 2023-24 पर टिप्पणी की, और तमाम संगठनों ने चर्चा और बजट के बाद के परामर्शों का आयोजन किया। उन संगठनों में से अधिकांश ने केंद्रीय बजट में सामाजिक क्षेत्र की हिस्सेदारी पर विचार-विमर्श किया। इनमें से एक महत्वपूर्ण पक्ष, जो चर्चा का विषय बना हुआ है, वह है शिक्षा। 2022-23 के बजट अनुमान (बीई) और 2022-23 के संशोधित अनुमान (आरई) की तुलना में बजट वृद्धि को शिक्षा मंत्रालय के आवंटन में वृद्धि के रूप में समाचार पत्रों और वेब पोर्टलों द्वारा सराहा गया है।

यह लेख शिक्षा के क्षेत्र के लिए आवंटन की गुणवत्ता का विश्लेषण करने की कोशिश करेगा। शिक्षा बजट का आकलन सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के संदर्भ में बजट की हिस्सेदारी, कुल व्यय बजट में शिक्षा बजट का प्रतिशत हिस्सा और पिछले पांच वर्षों में इसकी प्रवृत्ति, शिक्षा मंत्रालय के विभिन्न विभागों की मुख्य विशेषताएं और प्रमुख बिंदुओं अथवा विभिन्न प्रमुख कार्यक्रमों और योजनाओं की मुख्य विशेषताओं को देखकर किया जा सकता है। बजट को देखने के लिए एक महत्वपूर्ण तरीक़ा शिक्षा तंत्र की वर्तमान मात्रा (नामांकन दर, शिक्षण संस्थानों की संख्या, शिक्षकों की स्थिति, आदि) और शिक्षा व्यवस्था की वर्तमान ज़रूरतों का आकलन करना है।

बजट 2023-24 ने जीडीपी के शैक्षिक क्षेत्र में होने वाले ख़र्च के प्रतिशत के बारे में चर्चा फिर से शुरू कर दी है। यह अपरिहार्य है क्योंकि जीडीपी के प्रतिशत के कोण से शैक्षिक व्यय को देखने से यह पता चलता है कि नागरिक इस बात पर ध्यानपूर्वक विचार करते हैं कि शिक्षा पर वर्तमान ख़र्च अर्थव्यवस्था के विकास में कितनी दूर तक मदद करता है।

शैक्षिक ख़र्च और शिक्षा में जीडीपी के 6% की वंशावली

पिछले दो दशकों में भारत के शिक्षा क्षेत्र में स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और नामांकन के मामले में बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ है। इस विस्तार ने दो समस्याएं उत्पन्न कीं :- न्यायसंगत हिस्सेदारी (इक्विटी) और गुणवत्ता की कमी। इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए  देश की शिक्षा व्यवस्था को उचित धन ख़र्च करने की आवश्यकता है। शिक्षा क्षेत्र के लिए बजट इस दिशा में पहला क़दम हो सकता है। क्योंकि बीई का मतलब शिक्षा के लिए वास्तविक राशि नहीं है, बल्कि यह सिर्फ़ एक अनुमानित आवंटन है जो आवश्यक रूप से वित्तीय वर्ष में ख़र्च नहीं किया जा रहा है। इसलिए, स्वस्थ और उचित आवंटन शिक्षा क्षेत्र के प्रति सरकार की मंशा को व्यक्त कर सकता है। स्कूल से विश्वविद्यालय तक एक विशाल शिक्षा व्यवस्था को मद्दे-नज़र रखने के लिए मौजूद चुनौतियों और समस्याओं को दूर करने के लिए वित्तीय संसाधनों के आवंटन की उचित मात्रा की आवश्यकता है।

प्रमुख विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं ने मानव विकास में शिक्षा के महत्व के साथ-साथ गुणवत्ता प्रदान करने की आवश्यकता को महसूस किया है। इसलिए, ये देश शिक्षा क्षेत्र के लिए पर्याप्त मात्रा में आवंटन करते हैं। भारत में शिक्षा आयोग 1964-66, जिसे कोठारी आयोग के नाम से जाना जाता है, ने भी शिक्षा क्षेत्र के लिए एक उचित राशि आवंटित करने की आवश्यकता महसूस की। आयोग ने सिफ़ारिश की कि “यदि शिक्षा को पर्याप्त रूप से विकसित करना है, तो शिक्षा के लिए आवंटित सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) का अनुपात 1985-86 में 6.0 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा”[1]। बाद में 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति द्वारा इस सिफ़ारिश को स्वीकार कर लिया गया। जे.बी. तिलक[2] के तर्क के अनुसार, कोठारी आयोग की इस सिफ़ारिश की ग़लत व्याख्या की गई और राजनीतिक दलों ने सिफ़ारिश पर विवाद पैदा किया और तर्क दिया कि यह अनावश्यक था क्योंकि अगर केंद्र सरकार, राज्य सरकार और परिवारों द्वारा निजी ख़र्च को देखा जाए तो देश जीएनपी के 6% से अधिक ख़र्च कर रहा है। लेकिन इस विवाद को यूपीए सरकार के सामान्य न्यूनतम कार्यक्रम (7 जून 2004) द्वारा शिक्षा पर जीडीपी का 6% ख़र्च करने का वचन देकर सुलझा दिया गया था। दस्तावेज़ में कहा गया कि भारत का सबसे बड़ा संसाधन इसके लोग हैं। हमारे मानव संसाधनों की पूरी क्षमता का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाना अभी बाक़ी है। इसलिए शिक्षा को उच्च प्राथमिकता दी जाएगी। सरकार प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के लिए निर्धारित आधी राशि के साथ, जीडीपी के कम से कम 6% तक सार्वजनिक शिक्षा पर ख़र्च को बढ़ाने का लक्ष्य रखेगी। हालांकि यूपीए-I, 2004 ने बड़ी महत्वकांक्षा से शपथ ली थी कि वे 6% सार्वजनिक ख़र्च शिक्षा पर करेंगे मगर वास्तव में यदि राज्य सरकारों और केंद्र सरकार दोनों के ख़र्च को जोड़ दिया जाए तो भी जीडीपी का 3.5% भी पार नहीं हुआ था। 2004-05 के दौरान, शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय जीडीपी का 3% था और 2008-09 के दौरान इसे बढ़ाकर 3.4% कर दिया गया[4]। 2009-10 के दौरान शिक्षा व्यय जीडीपी के 3% तक और नीचे आ गया। एनडीए के शुरुआती कार्यकाल के दौरान, 2014-15 में शिक्षा व्यय 3.1% था[5] जो 2015-16 में फिर से घटकर 2.8% हो गया। तब से यह 2016-17 से 2022-23[6] तक 2.8-2.9 प्रतिशत के बीच स्थिर रहा है। इस प्रतिशत में मामूली वृद्धि केवल उस वर्ष के दौरान हुई जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति पेश की गई थी। नीचे दिए गए ग्राफ़ में पिछले दस वित्तीय वर्षों (FY) का लगभग सपाट वक्र (curve) बताता है कि शिक्षा तंत्र की मात्रा में भारी वृद्धि के बावजूद शिक्षा व्यय डीएस कोठारी की सिफ़ारिश की तुलना में केवल आधा है।

स्त्रोत: लेख में संदर्भित विभिन्न दस्तावेजों से लेखक द्वारा की गयी गणना

पिछले दशक में, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के रूप में शिक्षा के क्षेत्र में एक दिलचस्प तरक़्क़ी हुई। कोठारी आयोग के 54 वर्षों के बाद, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1992) के 28 वर्षों के बाद और UPA-1 के सामान्य न्यूनतम कार्यक्रम के 16 साल बाद – एनईपी 2020 सामने आई जिसने शिक्षा के क्षेत्र में जीडीपी के कम से कम 6% ख़र्च करने की सिफ़ारिश की थी। एनईपी 2020 में देखा गया है और वादा किया गया है कि “ये नीति शैक्षिक निवेश में महत्वपूर्ण वृद्धि करने के लिए प्रतिबद्ध है, क्योंकि हमारे युवाओं की उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा की तुलना में समाज के भविष्य के लिए कोई बेहतर निवेश नहीं है। दुर्भाग्य से, भारत में शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय जीडीपी के 6% के अनुशंसित स्तर के क़रीब भी नहीं आया है, जैसा कि 1968 की नीति द्वारा परिकल्पित किया गया था, 1986 की नीति में दोहराया गया था, और जिसकी 1992 की नीति की समीक्षा में फिर से पुष्टि की गई थी”[7]। नीति आगे कहती है, “केंद्र और राज्य जल्द से जल्द जीडीपी के 6% तक पहुंचने के लिए शिक्षा क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश बढ़ाने के लिए मिलकर काम करेंगे। यह उच्च-गुणवत्ता और न्यायसंगत सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को प्राप्त करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है जो वास्तव में भारत के भविष्य की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक और तकनीकी प्रगति और विकास के लिए आवश्यक है।” (पूर्वोक्त)

अंत में, शिक्षा के क्षेत्र में सार्वजनिक ख़र्च के महत्व को देखते हुए, उपरोक्त आंकड़े बताते हैं कि एनईपी 2020 से पहले और एनईपी 2020 के बाद शिक्षा क्षेत्र में जीडीपी के प्रतिशत के रूप में सरकारी ख़र्च स्थिर है और इसमें कोई कमी नहीं आई है। दूसरी ओर, स्कूल से विश्वविद्यालय तक के शिक्षा तंत्र में कई शैक्षणिक संस्थानों, नामांकन दर और कई शिक्षकों के मामले में भारी वृद्धि देखी गई। साथ ही, स्कूली शिक्षा के माध्यमिक स्तर पर अभी भी बड़ी संख्या में ड्रॉपआउट दर देखी जा रही है, और एनईपी 2020 में विभिन्न शैक्षिक लक्ष्यों को जोड़ा गया है। सवाल बरक़रार शैक्षिक ख़र्च पर जीडीपी का वर्तमान 3% भारतीय शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों और आकांक्षाओं को दूर करने के लिए कितना पर्याप्त है? और मौजूदा ख़र्च भारतीय शिक्षा प्रणाली की ज़रूरतों को पूरा करने में कैसे सक्षम हो सकता है?

संदर्भ:

[1] P. 149, Chapter 9, Economic Survey Report 2014-15, Ministry of Finance, Government of India, New Delhi.

[2] P. 148, Chapter 6, Economic Survey Report 2022-23, Ministry of Finance, Government of India, New Delhi.

[3] P.60 National Education Policy 2020, Government of India, New Delhi

[4] P.893, Education Commission of India-1964-66, Government of India

[5] Tilak, J. B., & Tilak, J. B. (2018). The Kothari commission and financing of education. Education and Development in India: Critical Issues in Public Policy and Development, 255-282.

[6] P.6 https://prsindia.org/files/policy/Policy_President_Speech/2004.pdf Accessed on 6th February, 2023

[7] https://loksabhadocs.nic.in/Refinput/New_Reference_Notes/English/BUDGET.pdf Accessed on 6th February, 2023.

अंग्रेज़ी से अनुवाद:  उज़्मा सरवत

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