भारतीय मुसलमानों के जनसंख्या वृद्धि की पड़ताल….

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पिछले 20 सालों में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि की दर हिंदुओं की तुलना में अधिक गिरी..अपनी आदत के अनुसार फिर हिंदू मुस्लिम पर खेल करने के लिए इस देश के सबसे तेज चैनल (आज तक) पर जनसंख्या विस्फोट को लेकर बातचीत करना शुरू हो गया है। और यह अकेला शुरू नहीं होता आप जानते हैं पहले किसी चैनल पर आएगा, फिर कोई बड़ा राजनेता इस पर कुछ कहेगा, आदि लेकिन इनमें से कोई भी आंकड़े का चिंता नहीं करता या कोई भी यह बात नहीं करता कि सेंसस के बाकी जगहों के आंकड़े (डाटा) क्या बता रहे हैं?असल में एक मालथस नाम का एक अर्थशास्त्री हुआ है उन्होंने एक समय में बताया कि “जनसंख्या वृद्धि ही सारी समस्याओं का जड़(कारण) है।” बाद में उन बातों पर बहस हुई बहुत, सारे नई चीजें आई, बहुत सारे अध्ययन हुए जिसके बाद विशेषज्ञों पहली बात तो यह कही गई कि अगर कोई भी बच्चा पैदा होता है तो वह एक पेट लेकर पैदा नहीं होता है कि वह धरती पर आकर बोझा बनाएगा। वह दो हाथ दो पांव और एक दिमाग भी लेकर पैदा होता है । जब वह बच्चा पैदा होता है तो वह धरती का बोझ नहीं बढ़ा रहा होता है बल्कि वह धरती को नए साधन भी दे रहा होता है। अर्थात दुनिया का हर बच्चा मेहनत करने वाले हाथ, मेहनत करने वाले पांव और धरती को बेहतर बनाने के लिए काम करने वाले दिमाग भी लेकर आता है। लेकिन हिंदुस्तान में तो कम से कम जनसंख्या जो है वह परमानेंट चीज है। कभी भी कोई इस मुद्दे को लेकर उठ जाता है और देश की हर समस्या का ठीकरा जनसंख्या पर फोड़ जाता है।देश के किसी भी समस्या की बात कीजिए तो ऐसे विशेषज्ञ सर पकड़ता हुआ बोलेगा की जनसंख्या वृद्धि सबसे बड़ा कारण है। आपको याद होगा कि हमारे देश के प्रधानमंत्री ने भी दिल्ली के लाल किले से जनसंख्या वृद्धि को देश के विकास में सबसे बड़ी चुनौती बता चुके हैं। उसके बाद बीजेपी के एक राज्यसभा सांसद (दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर) राकेश कुमार सिन्हा एक प्राइवेट बिल लेकर भी आए थे। इसके अलावा भी बिल कई कई बार संसद में हैं लाए गए हैं, जिसमें यह प्रस्ताव किया गया है कि जनसंख्या निरंतर के लिए दो बच्चों पर चीजों को लिमिट किया जाए, 2 बच्चों से अधिक पैदा करने पर कानूनी जूर्म बनाया जाए या फिर इस तरह की बातें कई सारे राज्य में आपने देखा है कि 2 बच्चों से जो तीसरा बच्चा होता है तो उसे किसी भी प्रकार की सरकारी सुविधाएं नहीं मिलेगी। हमें अब यह देखना है कि क्या पिछले कुछ सालों में वाकई जनसंख्या में वृद्धि हुई है उनकी आंकड़ों पर नजर डालते हैं——–

–1. हमारे देश की जो जनसंख्या वृद्धि है वह लगातार कम होती जा रही है तो जनसंख्या बढ़ने की समस्या है ही नहीं। 2.TFR:- इसके साथ माना जाता है कि 2.1 की जो टीएफआर है वह जनसंख्या को स्टेबल करने के लिए या बराबर करने के लिए बहुत जरूरी है।3.NFHS:-आंकड़ों के मुताबिक —-NFHS के आंकड़े को देखने के पश्चात पता चलता है कि हमारा TFR (Total fertility rate) जो लगातार लगातार कम होता जा रहा है। वर्तमान समय में देश का TFR 2% के आसपास है।इस आधार पर हम कह सकते हैं कि TFR डिस्टेबलाइजेशन रेट से भी नीचे है।किसी भी NFHS को देखेंगे तो मुसलमानों के बीच में उसके महिलाओं के बीच में यह TFR रेट सबसे ज्यादा कम हुआ है आप कंप्लीट पॉपुलेशन के मामले में भी देख लीजिए। अगर आप वर्ष 1997 से 2011 तक का आंकड़ा देखते हैं तो 1991 से 2001 के बीच में हिंदुओं के वृद्धि दर में जो कमी है, पापुलेशन ग्रोथ रेट में जो कमी आई है वह -3.1है। जबकि मुसलमानों में -4.7 है। 16 अक्टूबर 2021 में टाइम्स ऑफ इंडिया में एक आर्टिकल छपा जिसका शीर्षक- Rate of Muslim rise fell more than Hindus in 20 years. जनसंख्या वृद्धि का रोना इसलिए रोया जाता है क्योंकि इस देश में या दुनिया के स्तर पर जो संसाधनों का बंटवारा असमान है।

स्वास्थ्य एवम परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार द्वारा संकलित

विस्तृत रिपोर्ट

https://main.mohfw.gov.in/basicpage-14

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