कैंपस खोलने की माँग को लेकर IIMC में छात्रों का प्रदर्शन जारी

कैंपस खोलने की मांग को लेकर IIMC के नई दिल्ली स्थित कैंपस में पिछले 6 दिनों से छात्र धरना दे रहे हैं। उनकी मांग है कि दूसरे सत्र की पढ़ाई क्लासरूम में ऑफ़लाइन होनी चाहिए। हालांकि प्रशासन की कैंपस खोलने को लेकर इस समय कोई रूचि नहीं नज़र आ रही है।

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नई दिल्ली | कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच इस समय देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्रों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कहीं आख़िरी सत्र की परीक्षाओं और बोर्ड परीक्षाओं को टालने की मांग की जा रही है तो वहीं दिल्ली के विभिन्न कॉलेजों और कैंपसेज़ के छात्र परिसर खोलने की मांग पर अड़े हुए हैं। कैंपसेज़ न खुलने से कई छात्रों का नुक़सान हो रहा है। पिछले महीने जामिया मिल्लिया इस्लामिया, जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने कैंपस खोलने की मांग को लेकर कई प्रदर्शन किए। अब इसी सूची में देश का विख्यात पत्रकारिता संस्थान IIMC (भारतीय जनसंचार संस्थान) भी शामिल हो गया है।

कैंपस खोलने की मांग को लेकर IIMC के नई दिल्ली स्थित कैंपस में पिछले 6 दिनों से छात्र धरना दे रहे हैं। उनकी मांग है कि दूसरे सत्र की पढ़ाई क्लासरूम में ऑफ़लाइन होनी चाहिए। हालांकि प्रशासन की कैंपस खोलने को लेकर इस समय कोई रूचि नहीं नज़र आ रही है।

भारतीय जनसंचार संस्थान में चार बड़े पत्रकारिता और जनसंचार से संबंधित पाठ्यक्रम हैं। इनके आलावा क्षेत्रीय भाषाओं में पत्रकारिता के भी पाठ्यक्रम हैं। IIMC के दिल्ली कैंपस में तक़रीबन हर वर्ष 300 विद्यार्थियों को प्रवेश मिलता है। इनमें से ज़्यादातर की मांग है कि अब दूसरे सत्र में कैंपस को खोला जाना चाहिए।

छात्रों का कहना है कि प्रशासन ने उन्हें पहले सत्र के दौरान यह वादा किया था कि उनकी दूसरे सत्र की पढ़ाई और तमाम प्रायोगिक प्रोजेक्ट्स संस्थान के परिसर में होंगे। हालांकि इस वादे का कोई लिखित प्रमाण नहीं है। उनका मत है कि पत्रकारिता की पढ़ाई ऑनलाइन माध्यमों के ज़रिए संभव नहीं है। डिजिटल मीडिया के इस दौर में एक पत्रकार को जो तमाम सॉफ़्टवेयर्स और तकनीक मालूम होना चाहिए उन्हें ऑनलाइन सीखना बेहद मुश्किल है।

हिंदी पत्रकारिता के छात्र सुमित रजक कहते हैं कि, “ऑनलाइन कक्षाओं में हमें सैद्धांतिक ज्ञान तो मिला लेकिन टीवी या डिजिटल माध्यमों में काम करने के लिए हमें जिस प्रायोगिक ज्ञान की ज़रूरत है उसे ऑनलाइन नहीं सीखा जा सकता है। फ़ोटो, विडियो एडिट करने या किसी अख़बार के लेआउट को तैयार करने के लिए आपके पास अपना कंप्यूटर और सॉफ़्टवेयर होना चाहिए। पिछड़े क्षेत्रों और ग़रीब पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के पास ये तमाम सुविधाएं नहीं हैं। इसी तरह पत्रकारिता और भारत के इतिहास से सम्बन्धित महंगी किताबें छात्र नहीं ख़रीद सकते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि प्रशासन कैंपस खोले ताकि छात्र संस्थान की लैब और लाइब्रेरी से फ़ायदा उठा सकें।”

उर्दू पत्रकारिता के छात्र उबैदुल्लाह का कहना है कि, “बहुत से संघर्षों के बाद एक छात्र आईआईएमसी जैसे संस्थान में प्रवेश लेता है। उससे कोर्स की एक मोटी फ़ीस वसूली जाती है। इस फ़ीस में उससे लाइब्रेरी चार्ज, लैब फ़ीस, सिक्यूरिटी फ़ीस, स्पोर्ट्स के लिए फ़ीस और न जाने क्या-क्या शामिल होता है। हम छात्रों को ऑनलाइन ट्यूशन तो मिली लेकिन हमसे फ़ीस ऑफ़लाइन की वसूली गई। हमारा एक मुद्दा यह भी है कि जब ऑनलाइन क्लासेज़ ही होने थे तो हमसे इतनी मोटी फ़ीस क्यों ली गई है?”

छात्रा दीपशिखा पाण्डेय का कहना है कि, “पत्रकारिता पढ़ना सिर्फ़ सिद्धांतों को ही पढ़ लेना नहीं है बल्कि यह व्यवहारिक शिक्षा पाने जैसा है, कैमरा को कैसे आपरेट करें, विडियो फ़्रेम्स की समझ, विडियो–ऑडियो एडिटिंग के सॉफ़्टवेयर्स को ऑनलाइन नहीं सीखा जा सकता है। मीडिया इंडस्ट्री में टीम वर्क को बहुत अहम माना जाता है। कहने को यहां छात्रों की टीम्स तो हैं लेकिन सब बिखरें हुए हैं। कैंपस अगर खुला होता तो छात्र मिलकर प्रोजेक्ट्स भी करते और एक दूसरे से बेहतर तरीक़े से सीखने के साथ साथ सही अर्थ में टीम वर्क को समझ पाते।”

दीपशिखा आगे कहती हैं कि, “जब संस्थान के भीतर ही कई तरह के कार्यक्रम, संगोष्ठी, मिलन समारोह आयोजित हो सकते हैं तो संस्थान अपने छात्रों को कैंपस आने से क्यों रोक रहा है? बात की जाए तो देश में कई धार्मिक अनुष्ठान हो सकते हैं, चुनावी सभाएं हो सकती हैं, वहां क्या कोरोना नहीं होता? क्या सिर्फ़ कोरोना छात्रों की नोटबुक और शैक्षणिक संस्थानों में ही पाया जाता है?”

हिंदी पत्रकारिता की छात्रा मैत्री कुमारी बताती हैं कि, “हम सभी छात्रों से एडमिशन के समय दूसरे सत्र में ऑफ़लाइन पढ़ाई का वादा किया गया था। फ़रवरी से ही फ़िज़िकल क्लासेज़ की मांग की जा रही है। लेकिन प्रशासन कोरोना का बहाना बना कर छात्रों को कैंपस आने से रोक रहा है।”

8 अप्रैल को संस्थान की ओर से जारी किए गए एक पब्लिक नोटिस में प्रशासन ने प्रायोगिक कार्यों के लिए संभावित रूप से 26 अप्रैल से कैंपस खोलने की बात लिखी है। हालांकि संस्थान ने कैंपस आने वाले छात्र-छात्राओं किसी भी तरह की हास्टल सुविधा देने से साफ़ मना किया है। ऐसे में छात्रों का मानना है कि यह नोटिस सिर्फ़ प्रदर्शन को ख़त्म करने के लिए एक झूठा आश्वासन है।

छात्रों का सबसे अहम सवाल है कि जब उन्होंने अपनी फ़ीस जमा करते समय उसमें लाइब्रेरी, लैब, स्टाफ़, गेस्ट फ़ैकल्टी की विज़िट, स्पोर्ट्स, इन्फ़्रास्ट्रक्चर सबका शुल्क दिया है तो उन्हें इनके इस्तेमाल से क्यों रोका जा रहा है? या तो संस्थान खोला जाए या उनकी बक़ाया फ़ीस को माफ़ किया जाए।

कैंपस खोलने की मांग के आलावा भी छात्रों के कई मुद्दे हैं जिनको लेकर भी वे लगातार संस्थान से सवाल कर रहे हैं। जैसे एक सरकारी संस्थान में इतनी भारी फ़ीस का होना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। ग़रीब पृष्ठभूमि और कथित निचली जातियों व समुदायों से आने वाले छात्र-छात्राएं यहां की इतनी भारी फ़ीस के कारण प्रवेश नहीं ले पाते हैं। इसी कारण हर वर्ष संस्थान में SC/ST श्रेणी की सीटें ख़ाली रह जाती हैं। इसी तरह संस्थान में स्नातकोत्तर स्तर की पढ़ाई होती है लेकिन कैंपस को 24*7 नहीं खोला जाता है जोकि सही नहीं है। इन मुद्दों पर पिछले वर्षों में भी कई छात्रों ने प्रदर्शन किए हैं।

रिपोर्ट: अज़हर अंसार

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