अपने समय को‌ दर्ज करने का एक ईमानदार प्रयास है ‘कीर्तिगान’

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पुस्तक: कीर्तिगान

लेखक: चंदन पाण्डेय

भाषा: हिन्दी

प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन

मूल्य: 250/-

राजकमल प्रकाशन द्वारा हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘कीर्तिगान’ चंदन पाण्डेय का दूसरा उपन्यास है। अमूमन किताबों के कवर revealing हुआ करते हैं और किताब में दर्ज बात को पाठकों के सामने थोड़ा-बहुत बयान कर देते हैं। लेकिन ‘कीर्तिगान’ का कवर पाठकों को थोड़ा ज़्यादा आकर्षित करता है और अपने आप में एक नया प्रयोग है। पहली बार देखने में यह अटपटा लग सकता है लेकिन ग़ौर करेंगे तो मालूम होगा कि यह एक अख़बार का layout है। प्रकाशित होने से पहले किसी भी अख़बार का जो प्रतिरूप होता है, उसे इस किताब का कवर बनाया गया है। अख़बार के नाम के स्थान पर ‘कीर्तिगान’ दर्ज है और तारीख़ की जगह लिखा गया है – 2022 की किसी सुबह। शोएब शाहिद इस बेहतरीन कवर को डिज़ाइन करने के लिए बधाई के पात्र हैं।

अगर ‘साहित्य समाज का आईना है’ तो ‘कीर्तिगान’ ने बहुत साफ़गोई और ईमानदारी से इस आईने की धूल साफ़ करने की कोशिश की है। यह एक उपन्यास होने के साथ-साथ एक दस्तावेज़ी हैसियत भी रखता है। दस्तावेज़, एक समाज के रूप में हमारी असफलता का! दस्तावेज़, उन कुकृत्यों का जो धर्म की आड़ में और धर्म के नाम पर हम करते आ रहे हैं! दस्तावेज़, भीड़ हत्याओं का!

‘कीर्तिगान’ अपने समय को‌ दर्ज करने का एक प्रयास है। यूं तो इसमें ऐसा कुछ नहीं लिखा गया है जो हम न जानते हों लेकिन जैसा कि जॉर्ज ऑरवेल कहता है कि सबसे अच्छी पुस्तकें वे‌ होती हैं जो हमें वो बताती हैं जो हम पहले से जानते हैं। इस दृष्टि से देखें तो ‘कीर्तिगान’ का लिखा जाना एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाएगी।

उपन्यास का विषय निम्नतम स्तर पर पहुंच चुकी मानवीय संवेदना है, जिसमें मूल्यों की कोई जगह बाक़ी नहीं बची है और इसी का परिणाम है भीड़ हत्याएं जिन्हें इस उपन्यास का केंद्र बिंदु बनाया गया है। पटकथा की बात करें तो वह काफ़ी सधी हुई है। ‘कीर्तिगान’ नामक एक मीडिया समूह है जो एक ख़ास प्रॉजेक्ट पर काम कर रहा है, जिसमें भीड़ हत्या के शिकार हुए लोगों के आँकड़े जुटाए जाने हैं। कहानी दो‌ मुख्य किरदारों, सुनंदा और सनोज, के इर्द-गिर्द घूमती है जो इस प्रॉजेक्ट पर एक साथ काम कर रहे हैं। उपन्यास का पूरा प्लॉट इन्हीं दोनों के आसपास बुना गया है।

उपन्यास कई परतों में हमारे सामने खुलता है। सुनंदा और सनोज भीड़ हत्याओं के आँकड़े जुटाने निकले हैं। इस बीच पीड़ित परिवारों के साथ उनके अपने अनुभव हैं। चंदन ने इन अनुभवों को बहुत सूक्ष्मता के साथ बयान किया है। भीड़ द्वारा की गई निर्मम हत्याओं का इतना सूक्ष्म विवरण कर पाना, जिसे पढ़कर पाठक सिहर उठे, चंदन की शैली की विशेषता है। इसके अलावा इन भीड़ हत्याओं के नियोजनकर्ताओं की संतुष्टि और उन्हें प्राप्त राजनीतिक संरक्षण को भी बहुत खुलकर बयान किया गया है। यह दिखाने की भरपूर कोशिश की गई है कि सामाजिक और राजनीतिक ताक़तें किसके साथ हैं और नैरेटिव किसके पक्ष या‌ विपक्ष में बन रहे हैं या बनाए जा रहे हैं! साथ ही लेखक ने उपन्यास के पात्रों के माध्यम से यह समझने की कोशिश भी की है कि कैसे कोई भीड़ एक दिन अचानक किसी निहत्थे व्यक्ति पर हमलावर होकर उसे मार देती है, उसका मनोविज्ञान क्या होता है इत्यादि!

इस पूरे उपन्यास में सुनंदा और सनोज के बीच लगातार चल रही रोचक बहस है। सुनंदा के अनुसार ‘भीड़ हत्याएं अपनी बनावट में ऐतिहासिक और सामाजिक ताक़तों के शक्ति-प्रदर्शन का ज़रिया हैं’ जबकि सनोज ऐसा मानने को तैयार नहीं है। उसका मानना है कि इन हत्याओं में एक ‘पैटर्न है लेकिन लेकिन वह ऐतिहासिक न‌ होकर राजनीतिक है’। और उसे ऐतिहासिक बताकर हम एक बड़ी आबादी को दोषी क़रार दे रहे होते हैं। हालांकि आगे चलकर सनोज अपनी इस राय पर पुनर्विचार करते हुए सोचने पर विवश भी होता है कि ‘आज के दौर का यह ख़ून-ख़राबा आख़िर कितना पुराना है?’ वह सोचता है कि ‘आर्य समाज की स्थापना कब हुई थी या स्वामी दयानंद ने गौकरुणानिधि कब लिखी होगी? कोई तो सूत्र होगा जिसने गाय को दी रैडक्लिफ़ लाइन से पहले की विभाजन रेखा बना दिया था?’

‘परिवार’ को इस उपन्यास में ख़ासा महत्व हासिल है। सनोज कई वर्षों से अपने परिवार से दूर है। उसका तलाक हो चुका है और वह अपने दोनों बच्चों से भी एक‌ अरसे से नहीं मिला है। परिवार नामक समाजिक संस्था से उसका विश्वास तक़रीबन उठ चुका मालूम होता है।‌ लेकिन भीड़ हत्या के ऑंकड़े जुटाने के दौरान मृतकों के पीड़ित परिवारों से मिलकर उसकी समझ पर चोट पड़ती है। वह देखता है कि ‘परिवार एक धागा है और वह मृत व्यक्ति को उस धागे से अलग नहीं होने देता। … परिभाषाओं में परिवार भले ही समाज की इकाई हो लेकिन जब वह समाज विषाक्त हो चुका हो तब व्यक्तियों के अलावा परिवार नाम की स्थापना ही समाज के मुक़ाबिल खड़ी हो पा रही थी। … अन्याय ग्रस्त जो व्यक्ति विषाक्त इस समाज से लड़ना चाहता है उसे सर्वाधिक समर्थन परिवार से मिल रहा है। कोई मृतक ऐसा नहीं पाया जिसके लिए उसकी पत्नी, उसका घर, उसके भाई, उसके माँ-बाप अदालतों के चक्कर नहीं काट रहे हों।’

उपन्यास में सुनंदा का किरदार बहुत जीवंत है। वह बंग्लादेशी मूल की है और यह पहचान उसके साथ चलती है। उसकी इस पहचान को आधार बनाकर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लोगों के उसके प्रति व्यवहार को, जो उसे असहज करते हैं, लेखक ने दर्शाने की कोशिश की है।

सनोज का किरदार भी बहुत सलीक़े से बुना गया है। वह एक अच्छा पत्रकार और कवि है। दफ़्तर में होने वाली प्रतिदिन की बहसों से और भीड़ हत्या के ऑंकड़े जुटाने के दौरान उसके मस्तिष्क पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है जिसे लेखक ने बहुत अच्छी तरह प्रस्तुत किया है। मौजूदा वक़्त में जब टीवी पर होने वाली बहसें आम लोगों के मन-मस्तिष्क को बुरी तरह प्रभावित कर रही हैं और जब मेंटल हेल्थ की चर्चा पहले से कहीं ज़्यादा की जा रही है, एक आम पाठक के लिए सनोज की मानसिक स्थिति को समझना आसान हो जाता है।

इसके अलावा एक और मुख्य पहलू है जिसकी तरफ़ लेखक ने पाठकों का ध्यान खींचना चाहा है और वह है – मीडिया घरानों का असली चेहरा। मीडिया किस तरह काम करता है? उनके दफ़्तरों में किस प्रकार की बहसें होती हैं? किस तरह गुटबंदियां होती हैं? राजनिति का उन पर क्या प्रभाव पड़ता है? इन सवालों के जवाब एक आम पाठक को इस‌ उपन्यास के माध्यम से काफ़ी हद तक मिल जाएंगे।

इन सभी पहलुओं के दरमियान यूं तो इस उपन्यास में विकसित होती हुई एक‌ प्रेम कहानी भी है और सुनंदा और सनोज का अपना अतीत भी लेकिन उसे पूरे उपन्यास पर आरोपित कर देना बेईमानी होगी। यह उपन्यास अपने आप में, मुकम्मल तौर पर, अपने समय को दर्ज करते हुए एक दस्तावेज़ की सूरत में ही देखा जाना चाहिए। ऐसे समय में जब क़लम पर‌ पहरा बढ़ता जा रहा है और सरकार लगातार विरोध की आवाज़ों को दबाने की कोशिश कर रही है, इस उपन्यास के लिखे जाने को हिंदी साहित्य में किया गया एक साहसिक हस्तक्षेप ही कहा जायेगा। चंदन ने एक और काम किया है जो सामान्यतः उपन्यासों में देखने को नहीं मिलता, उन्होंने उपन्यास के अंत में उन किताबों और वेबसाइट्स का संदर्भ भी दिया है जिनसे उन्हें ‘कीर्तिगान’ लिखने के क्रम में सूचनाएं और प्रेरणा मिली।

समीक्षा: तल्हा मन्नान

1 COMMENT

  1. एक ईमानदाराना और पूरे उपन्यास को खोल कर पाठक के सामने प्रस्तुत कर देने वाला रिव्यू!
    शानदार!
    मुबारकबाद तल्हा!

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