धार्मिक स्वतंत्रता, धर्मांतरण और राज्य

राज्य का कोई धर्म न होना और प्रशासनिक कार्यों में धर्म का प्रत्यक्ष रूप से दख़ल न होना भी धार्मिक स्वतंत्रता क़ायम रखने के लिए ज़रूरी है। यदि राज्य ने बहुलतावादी समाज में किसी एक धर्म को सरकारी धर्म का दर्जा दिया और यदि विधि निर्माण और प्रशासनिक फ़ैसले किसी विशेष धर्म के आधार पर होने लगे या सरकारों को किसी विशेष धर्म की रक्षा अथवा प्रचार की चिंता होने लगे, तो अन्य धर्मों व दर्शनों की आज़ादी का दायरा तंग होने लगेगा और नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता ख़तरे में पड़ जाएगी।

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धार्मिक स्वतंत्रता, धर्मांतरण और राज्य

डॉक्टर नफ़ीस अख़्तर

अंतःकरण की और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने की आज़ादी मानव के मौलिक अधिकारों में शामिल है। आधुनिक विश्व ने इस मौलिक अधिकार को व्यापक रूप में मान्यता दी है। यूरोपीय महाद्वीप के देश लंबी धार्मिक लड़ाइयों के बाद जिस निष्कर्ष पर पहुंचे, वह यही था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म अपनाने और आचरण करने की आज़ादी मिलनी चाहिए तथा राज्य को न केवल यह कि धार्मिक मामलों में किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए अपितु उसे स्वयं के लिए इससे ख़ास दूरी बनाए रखना चाहिए। राज्य का धर्मनिरपेक्ष होना धार्मिक स्वतंत्रता का मानक क़रार पाया।

प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक ईसाइयों के बीच लंबे चले हिंसक धार्मिक विवादों के पश्चात यूरोप ने स्वतंत्रता, बंधुत्व तथा समानता पर आधारित धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र का मार्ग अपनाया। कैथोलिक चर्च का धर्म पर एकाधिकार समाप्त हुआ और उसके द्वारा जारी धार्मिक प्रताड़ना और दमन का अंत हुआ।

आधुनिक भारत के निर्माताओं ने यूरोप के निकट इतिहास से सबक़ लेते हुए धर्मनिरपेक्षता तथा लोकतंत्र के सिद्धांतों पर ही स्वतंत्र भारत की नींव रखी और धार्मिक एवं वैचारिक स्वातंत्र्य को संविधान की मौलिक अधिकारों की सूची में रखा। 25 नवंबर, 1981 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के कई अन्य उपकरणों के अनुसार धर्म की स्वतंत्रता को एक मौलिक मानवाधिकार के रूप में मान्यता देते हुए धर्म अथवा विश्वास के आधार पर सभी प्रकार की असहिष्णुता और भेदभाव के उन्मूलन पर घोषणा पारित की।

धार्मिक स्वतंत्रता में अपनी पसंद का धर्म स्वीकार करने, उस पर अमल करने, उसका प्रचार करने, उसे त्यागने और बदलने की आज़ादी शामिल है। इनमें से किसी एक पर प्रतिबंध व्यक्ति के मौलिक अधिकार पर प्रतिबंध है। व्यवहारिक‌ न सही लेकिन वैचारिक तौर पर आज की दुनिया इन प्रतिबंधों की क़ायल नहीं है। इस पर अब चर्चा भी समाप्त हो चुकी है। लेकिन प्रश्न यह है कि आख़िर धार्मिक स्वतंत्रता इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

वजह यह है कि इस तथ्य से इन्कार मुमकिन नहीं है कि धर्म मानव जीवन और उसके इतिहास का अभिन्न अंग रहा है और अभी भी है। मानवशास्त्र के अध्ययन से पता चलता है कि अतीत में भी कोई इंसानी समाज ऐसा नहीं रहा है जिसमें धर्म की भूमिका न रही हो। धर्म का संबंध विश्वदर्शन (World View) से है। हर व्यक्ति का अपना विश्वदर्शन होता है। दुनिया में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं जो दुनिया के बारे में कोई दर्शन या नज़रिया न रखता हो। दर्शन विहीन होना तो किसी के लिए संभव ही नहीं है। व्यक्ति का यही विश्वदर्शन उसके चरित्र का निर्माण भी करता है। यह दर्शन सही भी हो सकते हैं और ग़लत भी, जिनमें से सत्य तक पहुंचने का एकमात्र मार्ग विचार-विमर्श है। यदि हम इसका प्रचार और इसका स्वीकार करना प्रतिबंधित कर दें, तो सत्य लापता हो जाएगा। सत्य तक पहुंचने के लिए आज़ादी के साथ, बिना किसी भय के धार्मिक एवं दार्शनिक विचारों के आदान-प्रदान का वातावरण आवश्यक है। स्वतंत्र चेतना पर पाबंदी मानव संस्कृति के विकास में बाधा ही उत्पन्न करेगी।

धर्म एक ज़मीनी हक़ीक़त है। हर व्यक्ति किसी-न-किसी धर्म से जुड़ा हुआ है। जो लोग ख़ुद को नास्तिक समझते हैं या कहते हैं, वस्तुतः नास्तिकता उनका एक धर्म ही है। यदि राज्य किसी धर्म विशेष को सब पर थोपता है या किसी पर पाबंदी लगाता है, तो इससे अशांति जन्म लेगी। असहिष्णुता का वह माहौल पैदा होगा जिससे यूरोप बड़ी मुश्किल से बाहर आ सका है। इसी तरह धर्मान्तरण पर रोक समाज की तार्किकता और विवेक के लिए अवरोधक है। ‘वेल्थ ऑफ़ नेशन’ के लेखक एडम स्मिथ लिखते हैं –

“धर्म चुनने की अनुमति देना समग्र रूप से समाज और सिविल मजिस्ट्रेट के सर्वोत्तम हित में है, क्योंकि यह नागरिक अशांति को रोकने में मददगार और असहिष्णुता को कम करता है। जब तक एक समाज में पर्याप्त धर्म या धार्मिक संप्रदाय स्वतंत्र रूप से काम कर रहे होते हैं, वे सभी अपनी अधिक विवादास्पद और हिंसक शिक्षाओं को संयमित करने और सुधारने पर मजबूर होते हैं ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को धर्मान्तरण के लिए अपनी ओर आकर्षित कर सकें। यह धर्मान्तरण के लिए धार्मिक संप्रदायों के बीच मुफ़्त प्रतियोगिता है जो लंबे समय में स्थिरता और शांति सुनिश्चित करती है।”

धर्म चुनने की आज़ादी ही धर्म सुधार और धार्मिक मान्यताओं एवं कार्यों को तार्किक बनाने की ओर ले जाती है। फिर सबसे महत्वपूर्ण यह है कि धर्म पूर्ण रूप से एक व्यक्तिगत मामला है और किसी भी व्यक्तिगत मामले में राज्य को किसी तरह के हस्तक्षेप की अनुमति नहीं दी जा सकती है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समानता ही लोकतंत्र की आत्मा है। इसलिए एक व्यक्ति कब, कौन-सा धर्म स्वीकार करता है और कब किसे त्याग करता है यह उसके व्यक्तिगत फ़ैसलों और पसंद पर आधारित होना चाहिए। मानव समाज को, मानव चेतना पर दृढ विश्वास के साथ सिर्फ़ सत्य से प्रेम करना चाहिए। सत्य वैचारिक स्वतंत्रता को अपने लिए ख़तरा नहीं समझता, बल्कि इसे वह अपने प्रसार के लिए अनुकूल पाता है। कोई भी धर्म, आस्तिक अथवा नास्तिक, यदि वह सत्य पर होने का दावा करता है तो उसे प्रतिबंधों पर नहीं, अपनी तर्कशीलता पर भरोसा करना चाहिए।

व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना अवश्य ही राज्य का कार्य है। अतः उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि व्यक्ति की स्वतंत्रता किसी बाहरी दबाव का शिकार न हो। लेकिन इस बहाने उसे स्वतंत्रता के अधिकार का प्रयोग करने में व्यवधान पैदा करने का कोई हक़ नहीं है। राज्य का कोई धर्म न होना और प्रशासनिक कार्यों में धर्म का प्रत्यक्ष रूप से दख़ल न होना भी धार्मिक स्वतंत्रता क़ायम रखने के लिए ज़रूरी है। यदि राज्य ने बहुलतावादी समाज में किसी एक धर्म को सरकारी धर्म का दर्जा दिया और यदि विधि निर्माण और प्रशासनिक फ़ैसले किसी विशेष धर्म के आधार पर होने लगे या सरकारों को किसी विशेष धर्म की रक्षा अथवा प्रचार की चिंता होने लगे, तो अन्य धर्मों व दर्शनों की आज़ादी का दायरा तंग होने लगेगा और नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता ख़तरे में पड़ जाएगी।

इसका अर्थ यह बिल्कुल भी नहीं है कि राजनीतिक व्यवस्था में धर्म की कोई भूमिका नहीं होती है। हक़ीक़त यह है कि धर्म राजनीतिक व्यवस्था को पथ भ्रष्ट होने से बचाता है। एक तरफ़ तो धर्म चरित्र निर्माण करता है। समाज को नैतिक मूल्य प्रदान करता है, जिसका असर, यदि धर्म की शिक्षाओं को गंभीरता से लिया जाए तो, हमें राजनीतिक व्यवस्था और राजनेताओं में दिखाई दे सकता है, बल्कि दिखाई देना चाहिए। दूसरी तरफ़ लोकतंत्र में विधि निर्माण का आधार जिस जनमत पर होता है, उसके निर्माण में भी धर्म की भूमिका सबसे अधिक होती है या हो सकती है। यानि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह तो नहीं होना चाहिए कि विधि निर्माण का कार्य अप्रत्यक्ष रूप से धर्म के हवालों से किया जाने लगे, लेकिन अन्य दर्शनों और विचारों की भांति धर्म को भी किसी भी मामले में अपनी तार्किक शक्ति और मेरिट की बुनियाद पर जनमत बनाने का अधिकार मिलना ही चाहिए। फिर यह जनमत धर्म की बुनियाद पर नहीं, बल्कि अपने तर्क और गुणवत्ता के आधार पर विधि निर्माण का हिस्सा बने, तो धर्मनिरपेक्षा की स्प्रिट के बिल्कुल अनुकूल बात है और इसका स्वागत होना चाहिए।

एक वास्तविक और सत्य धर्म ख़ुद को ऊपर से थोपने के बजाय इसी तरह व्यक्ति को सम्बोधित करते हुए समाज का हिस्सा बनता है। वास्तविकता यह है और मानव इतिहास भी साक्षी है कि राज्य का कोई धर्म होने की सूरत में दमन, प्रताड़ना और हिंसा को कभी रोकना संभव नहीं हुआ है। चाहे समाज एक ही धर्म के मानने वालों पर आधारित क्यों न रहा हो।

मुसलमानों के इतिहास में अब्बासी, फ़ातिमी और उस्मानी राज्य इसके उदाहरण हैं और ईसाई तारीख़ में मध्यकालीन यूरोप का हाल इसकी मिसाल है। धर्म कोई भी हो, कालान्तर में अनेक व्याख्याओं का उत्पन्न होना स्वाभाविक होता है। अब किस मामले में कौन-सी व्याख्या अपनाई जाए, यह विवादास्पद हो जाता है और शासक वर्ग हमेशा अपने हित के अनुकूल व्याख्या को क़ुबूल करता है, बल्कि अपनी आवश्यकता के अनुसार नई व्याख्याएं गढ़ता है और ईश्वर या ख़ुदा के हवाले से उन्हें मनवाता भी है। आप उनसे असहमति का हक़ भी नहीं रखते क्योंकि ख़ुदा की बात पर आपत्ति का हक़ आपको नहीं है। जिन्होंने आपत्ति जताई, वे अपनी जानों से हाथ धो बैठे। ख़ुदा के हवाले से की गई कोई बात संशोधन की पात्र नहीं होती है।

सारांश यह है कि एक सच्चा धर्म और न्यायसंगत राज्य कभी इंसानों की आज़ादी पर पहरे नहीं बैठाता बल्कि वह हर व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से किसी विचार को मानने या न मानने की आज़ादी देता है। न किसी अन्य धर्म को वह कभी प्रचार से वंचित करता है क्योंकि उसे अपने तर्कों और गुणवत्ता पर पूरा भरोसा होता है।

(ये लेखक के अपने व्यक्तिगत विचार हैं। छात्र विमर्श का इन विचारों से सहमत होना आवश्यक नहीं है।)

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