मैलकम एक्स की हज यात्रा

मलिक शहबाज़ उर्फ़ मैल्कम एक्स (19 मई 1925 - 21 फ़रवरी 1965) अमेरिका के मशहूर अश्वेत नेता थे। उन्हें अश्वेत अमेरिकियों के अधिकारों हेतु आवाज़ बुलंद करने के लिए जाना जाता है। इस्लाम की शिक्षाओं से प्रेरित होकर उन्होंने इस्लाम क़ुबूल किया और 1964 में हज यात्रा करने के लिए मक्का गए। इस दौरान उन्होंने एक पत्र में अपने संस्मरण लिखे। हज यात्रा के दौरान उनके द्वारा लिखे गए पत्र का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है।

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मैलकम एक्स की हज यात्रा

हिन्दी अनुवाद: मुहम्मद इक़बाल

मलिक शहबाज़ उर्फ़ मैल्कम एक्स (19 मई 1925 – 21 फ़रवरी 1965) अमेरिका के मशहूर अश्वेत नेता थे। उन्हें अश्वेत अमेरिकियों के अधिकारों हेतु आवाज़ बुलंद करने के लिए जाना जाता है। उनकी आत्मकथा को पिछली सदी की सबसे प्रभावशाली किताबों में से एक माना जाता है।

मैल्कम एक्स ने इस्लाम की शिक्षाओं से प्रेरित होकर इस्लाम क़ुबूल किया और 1964 में हज यात्रा करने के लिए मक्का गए। हज यात्रा के दौरान उन्होंने एक पत्र में अपने संस्मरण लिखे। हज यात्रा के एक साल बाद अमेरिका में एक भाषण समारोह के दौरान 21 फ़रवरी 1965 के दिन 39 साल की उम्र में उनकी हत्या कर दी गयी थी। हज यात्रा के दौरान उनके द्वारा लिखे गए पत्र का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है –

“मैंने कभी ऐसा हार्दिक आदर-सत्कार और ज़बरदस्त उत्साह से भरपूर सच्चा भाईचारा नहीं देखा जैसा कि इस प्राचीन पवित्र भूमि में सभी रंग और नस्ल के लोगों द्वारा व्यवहार में लाते हुए देख रहा हूं, जो कि इब्राहीम, मुहम्मद और पवित्र ग्रन्थों में वर्णित दूसरे पैग़म्बरों का घर है। पिछले एक हफ़्ते से यहां की शालीनता को देख कर, जो मेरे चारों ओर सभी रंग के लोगों द्वारा व्यवहार में लाई जा रही है, मैं बिलकुल अवाक् और सम्मोहित हो चुका हूं।

मुझे पवित्र शहर मक्का के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैंने एक नौजवान मुहम्मद की रहनुमाई में काबा की सात बार परिक्रमा की। मैंने ज़म-ज़म के कुएं का पानी पिया। मैंने अल-सफ़ा और अल-मरवा पहाड़ियों के बीच सात बार इधर से उधर दौड़ लगाई। मैंने प्राचीन नगर मीना में और अराफ़ात की पहाड़ी पर इबादत की, जहां दुनिया के कोने-कोने से आये हुए लाखों हज यात्री थे। वे सब अलग-अलग रंग के थे। नीली आंखों वाले गोरों से लेकर काली त्वचा वाले अफ़्रीक़ियों तक, लेकिन हम सब एक ही तरह की धार्मिक क्रिया में भाग ले रहे थे जो कि एक ऐसी एकता और भाईचारे को प्रदर्शित कर रहा था जिसके बारे में मैं अमेरिका में रहते हुए समझता था कि श्वेत और अश्वेत लोगों के बीच में ऐसी एकता असंभव है।

अमेरिका को इस्लाम समझने की ज़रूरत है क्योंकि यही एक ऐसा धर्म है जिसने अपने समाज से नस्लीय समस्या को मिटा दिया है। पूरी मुस्लिम दुनिया के अपने सफ़र के दौरान मैं उन लोगों से मिला, बात की, यहां तक कि उनके साथ खाना खाया जिन्हें अमेरिका में गोरा माना जाएगा। लेकिन उनके दिमाग़ से श्वेत मानसिकता को इस्लाम धर्म द्वारा मिटा दिया गया था। मैंने सभी रंग और नस्लों द्वारा दूसरे रंग और नस्ल की परवाह किये बिना ऐसा निष्कपट और सच्चा भाईचारा व्यवहार में लाते हुए कभी नहीं देखा।

शायद आप मुझसे ऐसी बातें सुनकर हैरान हो गये होंगे लेकिन इस तीर्थयात्रा में जो मैंने देखा, जो अनुभव किया, उसने मुझे मजबूर किया कि मैं अपने पिछले सोचने के तरीक़ों को फिर से तय करूं और अपने कुछ पुराने निष्कर्ष एक तरफ़ किनारे रख दूं। ये मेरे लिए कोई मुश्किल काम नहीं था। मेरे दृढ़ निश्चय के बावजूद मैं हमेशा एक ऐसा आदमी रहा हूं जो तथ्यों का सामना करने की कोशिश करता है और अपने नये अनुभव और नयी जानकरी की रौशनी में जीवन की सच्चाई को स्वीकार करता है।

पिछले ग्यारह दिनों तक मुस्लिम दुनिया में रहने के दौरान मैंने उनके साथ एक ही प्लेट में खाना खाया, एक ही गिलास में पानी पिया और एक ही क़ालीन पर सोया, जिनकी आंखें नीली से भी नीली थीं और जिनके बाल भूरे से भी भूरे थे और जिनकी त्वचा श्वेत से भी श्वेत थी और बिल्कुल उन्हीं शब्दों, उन्हीं हरकतों में और उन्ही कर्मों में जैसे कि गोरे मुस्लिम करते थे, मैंने वही संजीदगी महसूस की जो मैं नाइजेरिया, सूडान और घाना के काले मुस्लिमों के साथ महसूस करता रहा हूं।

हम सब सच्चे भाई थे क्योंकि एक ख़ुदा के विश्वास ने गोरे होने के एहसास को उनके दिमाग़, उनके रवैये और उनके व्यवहार से मिटा दिया था।

मैं देख सकता हूं कि अगर अमेरिकी गोरे एक ख़ुदा के अक़ीदे को अपनाएंगे, तब शायद वे भी इंसानी एकता की इस हक़ीक़त को क़ुबूल कर पाएंगे और दूसरों के रंग-भेद के कारण उसका आकलन करना, रुकावट डालना और नुक़सान पहुंचाना छोड़ देंगे। नस्लवाद ने अमेरिका को लाइलाज कैंसर की तरह त्रस्त कर रखा है। तथाकथित गोरे अमेरिकी इसाईयों के दिल इस विनाशकारी समस्या के निवारण के लिए ज़्यादा‌ खुले होने चाहिए। शायद ये अमेरिका को आने वाली तबाही से बचा सकता है। बिल्कुल ऐसी ही तबाही जर्मनी में नस्लवादियों द्वारा लायी गयी, जिसके नतीजे में जर्मनी ख़ुद जर्मनों के हाथों तबाह हो गया।

इस पवित्र भूमि पर गुज़ारा गया प्रत्येक लम्हा मुझे उस बात को गहराई से समझने में सक्षम बनाता जा रहा है जो कि अमेरिका के कालों और गोरों के बीच में हो रहा है। अमेरिकी अश्वेतों को नस्लीय दुश्मनी के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। वे सिर्फ़ उस नस्लवाद की प्रतिक्रिया दे रहे हैं जो अमेरिकी गोरों द्वारा चार सौ साल से जान बूझ कर किया जा रहा है, लेकिन जैसा कि नस्लवाद अमेरिका को आत्महत्या की तरफ़ ले जा रहा है, मैं अपने अनुभव के आधार पर यह विश्वास करता हूं कि गौरे नौजवान जो कॉलेज और यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करते हैं, उनमें से कुछ सच्चाई की राह पर चलेंगे। नस्लवाद अमेरिका को जिस अवश्यंभावी तबाही की ओर ले जा रहा है, उससे सिर्फ़ यही चीज़ बचा सकती है।

मुझे इससे पहले कभी इतना सम्मानित नहीं किया गया। कौन उस बेपनाह आशीर्वाद पर विश्वास करेगा जो एक अमेरिकी नीग्रो को यहां मिला हैं! कुछ रातों पहले एक व्यक्ति जिसे अमेरिका में गोरा कहा जाएगा, जो संयुक्त राष्ट्र राजनयिक, राजदूत और राजा का सहयोगी भी है, उसने मुझे अपना होटल सुइट दिया, अपना बिस्तर दिया।

यहां के शासक प्रिंस फ़ैसल मेरे जेद्दाह में मौजूद होने से अवगत हो चुके थे। अगले दिन सुबह सवेरे प्रिंस फ़ैसल के बेटे ने ख़ुद आकर मुझे बताया कि उनके पिता के आदेश से मैं राज्य अतिथि बनाया गया हूं। डिप्टी चीफ़ प्रोटोकॉल ऑफ़िसर मुझे ख़ुद हज कोर्ट के बाहर तक लेकर गए। शैख़ मुहम्मद हरकून ने ख़ुद मेरे मक्का विज़िट करने का अनुमोदन किया। उन्होंने अपना हस्ताक्षर और मुहर लगाकर मुझे इस्लाम पर लिखी गई दो किताबें दीं और कहा कि वह अमेरिका में मेरे इस्लाम के प्रचार-प्रसार के काम के लिए दुआ करेंगे।

मुझे एक कार, एक ड्राइवर और एक गाइड दिया गया, जिसने इस पवित्र भूमि के यात्रा की मेरी ख़्वाहिश को मुमकिन बनाया। जिस शहर में भी मैं गया वहां सरकार की तरफ़ में मेरे लिए एयर कंडीशंड क्वार्टर और नौकरों की सुविधा दी गयी। मैं ख़्वाब में भी कभी नहीं सोच सकता था कि कभी मुझे इतना सम्म्मानित किया जायेगा। ऐसा सम्मान अमेरिका में किसी नीग्रो को नहीं मिलता बल्कि एक राजा को मिलता हैं।

सारी प्रशंसा उस एक अल्लाह के लिए है जो सारी दुनिया का रब है।”

आपका

अल-हाज मलिक शहबाज़ (मैलक्म एक्स)

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